जगदलपुर । झीरम घाटी नक्सली नरसंहार मामले में एनआईए (NIA) विशेष अदालत द्वारा 10 आरोपियों को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति एक बार फिर गर्मा गई है। अदालती फैसले के विरोध में सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोढ़ी द्वारा उठाए गए सवालों के ठीक बाद, प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के अध्यक्ष दीपक बैज ने प्रेसवार्ता कर फैसले को “आधा-अधूरा न्याय” करार दिया है और जांच एजेंसी की मंशा पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

“क्या सामान ढोने वाले ही थे साजिश के सूत्रधार?”
दीपक बैज ने सीधा हमला बोलते हुए कहा कि कोर्ट द्वारा जिन 10 लोगों को सजा सुनाई गई है, वे केवल जमीनी स्तर पर काम करने वाले निचले कैडर के लोग थे। आरोप-पत्र के अनुसार ये लोग नक्सलियों के लिए राशन जुटाने, रास्ते काटने, गड्ढे खोदने और सामान पहुंचाने जैसे छोटे-मोटे कार्यों में शामिल थे। बैज ने सवाल उठाया कि इतने बड़े और भयावह नरसंहार की पटकथा क्या ऐसे निचले स्तर के लोग लिख सकते हैं? क्या यही 10 लोग इस पूरी घटना के मास्टरमाइंड थे?
बड़े नक्सली नेताओं और समर्पण पर उठे सवाल
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि झीरम घाटी हमले की मुख्य साजिश रचने वाले शीर्ष नक्सली नेताओं तक जांच कभी पहुंच ही नहीं पाई। उन्होंने बारसे देवा और देवजी जैसे शीर्ष नक्सली कमांडरों का नाम लेते हुए कहा कि कई बड़े नक्सली नेता आत्मसमर्पण कर चुके हैं, लेकिन उन्हें इस मामले में अभी भी फरार दिखाया जा रहा है। बैज का आरोप है कि छोटे नक्सलियों को मोहरा बनाकर बड़े नक्सली आकाओं को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।
भाजपा सरकार पर साठगांठ का सीधा आरोप
जांच के दायरे को सीमित बताने के साथ-साथ दीपक बैज ने केंद्र की भाजपा सरकार और नक्सलियों के बीच साठगांठ का भी गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यदि जांच सही दिशा में चलती और असली साजिशकर्ताओं तक पहुंचती, तो कई चौकाने वाले राजनीतिक और आपराधिक राज बेनकाब हो सकते थे। बैज के अनुसार, जांच एजेंसियों ने राजनीतिक साजिश के पहलू की अनदेखी की है।
दिल्ली दरबार में मुद्दा उठाने और कानूनी लड़ाई की तैयारी
छत्तीसगढ़ कांग्रेस का कहना है कि यह फैसला न तो झीरम हमले में शहीद हुए नेताओं के परिवारों को संतुष्ट कर पाया है और न ही बस्तर की जनता को न्याय दिला पाया है। दीपक बैज ने स्पष्ट किया है कि:
- कांग्रेस पार्टी जल्द ही दिल्ली जाकर पार्टी आलाकमान के सामने इस पूरे मामले का ब्योरा रखेगी।
- इस अधूरे न्याय के खिलाफ अदालत में न्यायिक और कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी।
13 साल पुराने इस दर्दनाक हादसे में जहां कानून ने अपनी एक सीमा तय की है, वहीं पीड़ित परिवारों और विपक्षी कांग्रेस के ये सवाल यह संकेत देते हैं कि झीरम घाटी का सच जानने की यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।