डेस्क । ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की हालिया खोजी रिपोर्ट (Investigative Report) ने भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के भीतर चल रहे गंभीर मतभेदों और आंतरिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और अन्य दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी—के बीच मतदाता सूची पुनरीक्षण और डेटा एक्सेस को लेकर तीखी असहमति सामने आई है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
1. 10 महीनों में 14 बार लिखित आपत्ति
इंडियन एक्सप्रेस के खुलासे के मुताबिक, पिछले 10 महीनों के दौरान दोनों चुनाव आयुक्तों ने आयोग द्वारा लिए गए निर्णयों और जारी आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित रूप से असहमति दर्ज कराई। यह असहमति मुख्य रूप से स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और मतदाता पंजीकरण प्रक्रियाओं को लेकर थी।
2. वोटर रजिस्ट्रेशन फॉर्म 6 में बदलाव पर सवाल
रिपोर्ट के अनुसार, नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘फॉर्म 6’ में नियम बदले बिना नए प्रश्न जोड़ने की कोशिश की गई। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर संधु ने इसे नियम विरुद्ध और “अवैध” बताते हुए दर्ज किया कि वैधानिक नियमों (Rules) में संशोधन किए बिना फॉर्म के प्रारूप से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।
3. डेटाबेस और ERONet के नियंत्रण का मुद्दा
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि सॉफ्टवेयर और मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण (Centralisation) तथा एक्सेस कंट्रोल को लेकर दोनों आयुक्तों ने गंभीर चिंताएं जताईं। उन्होंने आरोप लगाया कि निचले स्तर के चुनाव अधिकारियों (ERO) के अधिकारों को सीमित किया जा रहा था और आयोग के संज्ञान के बिना IT सिस्टम में बदलाव किए गए। इस विषय पर दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव तक अपनी बात पहुंचाई।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और आरोप
- विपक्ष का हमला: रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही विपक्षी दलों (कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सपा, सीपीएम आदि) ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर एकतरफा और मनमाने ढंग से काम करने का आरोप लगाया। नेताओं का कहना है कि तीन-सदस्यीय आयोग में बहुमत (Majority) के निर्णय के नियम का पालन नहीं किया गया और मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने तथा SIR प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग की गई।
- आयोग की पारदर्शिता पर सवाल: बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय में बहुमत और सहमति से निर्णय लेने की परंपरा रही है, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार आयोग के अंदर संवादहीनता और फैसलों की गोपनीयता से संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
निर्वाचन आयोग की सफाई
इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट के बाद निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्टीकरण दिया:
- आयोग का कहना है कि SIR और वोटर लिस्ट से जुड़े सभी महत्वपूर्ण निर्णय सर्वसम्मति (Unanimous) से लिए गए हैं।
- आयोग के अनुसार, बहु-सदस्यीय निकाय में अलग-अलग मुद्दों (जैसे मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया) पर चर्चा, सुझाव और आपत्तियां आना आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इन्हें अंतिम निर्णय का विरोध नहीं माना जाना चाहिए।
निष्कर्ष
निर्वाचन आयोग जैसी स्वायत्त और संवैधानिक संस्था में आंतरिक असंतोष और प्रक्रियात्मक अनदेखी की खबरें लोकतंत्र के लिए एक चिंताजनक पहलू हैं। यदि चुनाव प्रक्रिया के सबसे महत्वपूर्ण घटक—वोटर लिस्ट और डेटा सुरक्षा—पर ही आयोग के भीतर से सवाल खड़े होते हैं, तो यह संस्थागत पारदर्शिता और जन-विश्वास पर गहरा प्रभाव डालता है।