डेस्क । विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा अपनी अनोखी और अनूठी रस्मों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। 75 दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक लोक-पर्व की सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक रस्मों में से एक है ‘मावली परघाव’। यह रस्म केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि दो देवियों के पावन मिलन, जन-आस्था और सदियों पुरानी परंपरा का एक जीवंत प्रतीक है।
क्या है ‘मावली परघाव’ और इसका अर्थ?
छत्तीसगढ़ी और हल्बी बोली में ‘परघाव’ का अर्थ होता है — आदर-सतकार के साथ स्वागत करना।
‘मावली परघाव’ वह पावन अवसर है जब शक्तिपीठ दंतेवाड़ा से मावली माता की छत्र (छत्र-छाया) और डोली को जगदलपुर स्थित दंतेश्वरी मंदिर लाया जाता है। जब दंतेवाड़ा की देवी ‘माता मावली’ जगदलपुर पहुँचती हैं, तो उनका स्वागत जगदलपुर की अधिष्ठात्री देवी ‘माता दंतेश्वरी’ के प्रांगण में पूरे बस्तर के जनमानस और राजपरिवार द्वारा अत्यंत श्रद्धा के साथ किया जाता है।

600 वर्षों का गौरवशाली इतिहास
मावली परघाव की परंपरा आज की नहीं, बल्कि 600 से अधिक वर्षों पुरानी है।
- रियासत काल की शुरुआत: बस्तर रियासत काल से ही यह रस्म अत्यंत धूमधाम और रीति-रिवाज के साथ निभाई जाती रही है।
- महाराजा रुद्रप्रताप देव का योगदान: बस्तर के महाराजा रुद्रप्रताप देव के शासनकाल में माई की डोली के भव्य और सम्मानजनक स्वागत की विशेष परंपरा शुरू हुई थी।
- परंपरा का निरंतर निर्वहन: राजा-रजवाड़ों का दौर भले समाप्त हो चुका हो, लेकिन बस्तरवासियों का अपनी संस्कृति और देवियों के प्रति विश्वास आज भी उतना ही अटूट है। राजपरिवार के सदस्य और स्थानीय लोग आज भी उसी राजसी सम्मान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ माई की डोली का स्वागत करते हैं।
नवरात्रि की नवमी को उमड़ता है जन-सैलाब
यह भव्य रस्म शारदीय नवरात्रि की नवमी तिथि को जगदलपुर के ऐतिहासिक दंतेश्वरी मंदिर प्रांगण में अदा की जाती है।
- आस्था का महासंगम: इस अलौकिक क्षण के साक्षी बनने के लिए न केवल बस्तर और छत्तीसगढ़, बल्कि देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु जगदलपुर पहुँचते हैं।
- आदिवासी संस्कृति की झलक: पारंपरिक वाद्य यंत्रों (ढोल, मोहरी, तुरही) की गूंज, शंखनाद और मंत्रोच्चार के बीच जगदलपुर का दंतेश्वरी मंदिर परिसर भक्तिमय माहौल से सराबोर हो उठता है।
- माई की आगवानी: जैसे ही दंतेवाड़ा से आई माता मावली की डोली मंदिर प्रांगण में प्रवेश करती है, पूरा परिसर “माई दंतेश्वरी की जय” और “मावली माता की जय” के जयकारों से गूंज उठता है।
आस्था, एकता और सांस्कृतिक धरोहर का संदेश
मावली परघाव बस्तर की उस लोक-संस्कृति को दर्शाता है जहाँ हर रीति-रिवाज में आत्मीयता, सम्मान और सामुदायिक एकता छिपी होती है। यह रस्म बस्तर के आदिवासियों, आम नागरिकों और तत्कालीन राजपरिवार के बीच के उस अटूट रिश्ते का प्रमाण है जो सदियों से चला आ रहा है।
बस्तर दशहरा का यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि समय के साथ बदलते दौर में भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं को किस प्रकार सहेजकर रखा जाता है।
निष्कर्ष: मावली परघाव बस्तर दशहरा का वह हृदयस्पर्शी अध्याय है, जहाँ देवी-भक्ति और जन-आस्था का ऐसा सुंदर संगम देखने को मिलता है जो दुनिया में शायद ही कहीं और देखने को मिले।