जगदलपुर: विश्व प्रसिद्ध 75 दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक बस्तर दशहरा का सबसे रोमांचक और अनूठा अध्याय तब लिखा गया, जब देर रात जगदलपुर की सड़कों से विशालकाय आठ पहियों वाला ‘विजय रथ’ अचानक गायब (चोरी) हो गया। यह कोई आपराधिक घटना नहीं, बल्कि बस्तर दशहरा की सदियों पुरानी ऐतिहासिक परंपरा ‘भीतर रैनी’ का मुख्य आकर्षण थी, जो पूरी विधि-विधान, उल्लास और जनजातीय रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुई।

इस ऐतिहासिक क्षण का गवाह बनने के लिए आधी रात को भी हजारों की संख्या में स्थानीय ग्रामीण, श्रद्धालु और दूर-दराज से आए पर्यटक मौजूद रहे।
सदियों पुरानी इस रस्म के पीछे का ऐतिहासिक संदर्भ
बस्तर दशहरा की परंपराएं सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि ये स्थानीय जनजातियों के स्वाभिमान, अधिकार और सामाजिक समरसता की प्रतीक हैं। ‘भीतर रैनी’ के दिन रथ चोरी होने के पीछे रियासत काल की एक बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायक कहानी जुड़ी हुई है:
- जनजातीय असंतोष और विद्रोह: रियासत काल के दौरान जब बस्तर दशहरा के आयोजनों में माड़िया (माड़िया/मुरिया) जनजाति के लोगों की उपेक्षा होने लगी और उन्हें उचित मान-सम्मान नहीं मिला, तो ग्रामीणों ने अपना विरोध दर्ज कराने का एक अनोखा तरीका निकाला।
- रथ का अपहरण: नाराज ग्रामीणों ने रात के अंधेरे में आठ पहियों वाले विशालकाय विजय रथ को चुरा लिया और उसे शहर से दूर कुम्हड़ाकोट के घने जंगलों में ले जाकर छिपा दिया।
- राजा की पहल और संवाद: जब राजा को इस बात का पता चला, तो उन्होंने बल प्रयोग करने के बजाय स्वयं कुम्हड़ाकोट के जंगल पहुंचे। राजा ने ग्रामीणों के बीच बैठकर उनके साथ भोजन किया, उनकी समस्याओं को सुना और उनकी नाराजगी दूर की।
तभी से यह परंपरा हर साल निभाई जाती है, जो यह संदेश देती है कि राजा और प्रजा के बीच संवाद और समानता ही शासन का असली आधार है।
‘भीतर रैनी’ का रोमांच: कैसे निभाई गई रस्म?
बस्तर दशहरा के दौरान दंतेश्वरी मंदिर परिसर और सिरहासार भवन के आसपास जब रथ परिक्रमा पूरी हुई, तो ‘भीतर रैनी’ की रात हजारों की संख्या में माड़िया जनजाति के युवा और ग्रामीण इकट्ठा हुए।
- गुप्त योजना और उत्साह: आधी रात के बाद, तय परंपरा के अनुसार ग्रामीणों ने विशालकाय रथ को खींचना शुरू किया।
- कुम्हड़ाकोट की ओर प्रस्थान: गाजे-बाजे और पारंपरिक नारों के बीच इस रथ को जगदलपुर शहर से लगभग 2 किलोमीटर दूर कुम्हड़ाकोट के जंगलों की ओर ले जाया गया।
- अगले दिन ‘बाहर रैनी’: परंपरा के अनुसार, अगले दिन बस्तर राजपरिवार के सदस्य और प्रशासनिक अधिकारी कुम्हड़ाकोट पहुंचेंगे, जहां ग्रामीणों के साथ पारंपरिक भोजन (नवाखाई/सामूहिक भोज) होगा और ग्रामीणों की नाराजगी दूर कर रथ को ससम्मान वापस लाया जाएगा, जिसे ‘बाहर रैनी’ रस्म कहा जाता है।
लोक संस्कृति और सामाजिक समरसता की मिसाल

बस्तर दशहरा दुनिया के अन्य भागों में मनाए जाने वाले दशहरा से बिल्कुल अलग है। यहाँ न तो रावण का पुतला जलाया जाता है और न ही राम-रावण युद्ध का मंचन होता है। यह पर्व बस्तर की अधिष्ठात्री देवी माँ दंतेश्वरी की आराधना और जनजातीय संस्कृति के समागम का प्रतीक है।
‘भीतर रैनी’ की यह अनूठी रस्म यह साबित करती है कि बस्तर की संस्कृति में लोकतंत्र और जन-भावनाओं का सम्मान प्राचीन काल से ही रचा-बसा है। आज भी हजारों माड़िया आदिवासियों द्वारा इस परंपरा को पूरी निष्ठा से निभाना बस्तर की जीवंत सांस्कृतिक धरोहर की झलक पेश करता है।

संक्षेप में: बस्तर दशहरा की ‘भीतर रैनी’ रस्म केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि बस्तर की समृद्ध जनजातीय विरासत, उनके अधिकारों की अभिव्यक्ति और राजा-प्रजा के ऐतिहासिक जुड़ाव का एक अद्भुत उदाहरण है।