जगदलपुर । विश्वप्रसिद्ध, ऐतिहासिक और लगातार 75 दिनों तक चलने वाले लोक-महापर्व बस्तर दशहरा 2026 की तैयारियाँ अपने पूरे शबाब पर हैं। इस अनूठे सांस्कृतिक एवं धार्मिक अनुष्ठान के तहत दशहरा के विशाल मांगलिक मंडप की विधिवत आधारशिला रखने वाली अत्यंत महत्वपूर्ण एवं पवित्र रस्म ‘डेरी गड़ाई’ सिरहासार भवन में पारंपरिक विधि-विधान से संपन्न होने जा रही है।

लोक-संस्कृति, देव-विधान और अटूट जन-आस्था का प्रतीक यह अनुष्ठान बस्तर के दशहरा पर्व को एक नए मांगलिक रूप में ढाल देता है।
बिलोरी से आएंगी पवित्र काष्ठ स्तंभ (डेरी)
पुरातन परंपरा का निर्वहन करते हुए, जगदलपुर नगर सीमा से सटे ग्राम बिलोरी के ग्रामीण पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ दो विशेष पवित्र काष्ठ स्तंभ (लकड़ियां) लेकर सिरहासार भवन पहुँचेंगे।
- बस्तर की पारंपरिक बोली और संस्कृति में इन विशेष लकड़ी के खंभों को ‘डेरी’ कहा जाता है।
- सिरहासार भवन परिसर में बस्तर दशहरा समिति, पारंपरिक पुजारियों और ग्रामीणों की उपस्थिति में इन पवित्र लकड़ियों का वैदिक एवं जनजातीय रीति-रिवाजों से पूजन-अर्चना किया जाएगा।
- इसके पश्चात तय मुहूर्त में सिरहासार भवन में इन स्तंभों को स्थापित (‘गड़ाई’) किया जाएगा, जो पूरे दशहरा मंडप के आच्छादन (छावनी) का मुख्य आधार बनते हैं।
आत्मीयता का प्रतीक: ‘हल्दी उत्सव’
डेरी गड़ाई और मंडप आच्छादन का यह अनुष्ठान पूर्ण होते ही बस्तर दशहरा का वातावरण और अधिक उल्लासमय और पावन हो उठता है। परंपरा के अनुसार, डेरी स्थापना के ठीक बाद मेंबरीनों (पारंपरिक व्यवस्थापकों/महिलाओं) द्वारा अत्यंत उत्साह के साथ ‘हल्दी उत्सव’ मनाया जाता है।
यह हल्दी खेल बस्तर दशहरा को केवल एक धार्मिक पर्व न बनाकर एक पारिवारिक एवं मांगलिक प्रसंग की तरह उल्लास, आत्मीयता और भातृभाव से भर देता है। एक-दूसरे को हल्दी लगाकर पर्व की शुभकामनाएं दी जाती हैं और आने वाले मुख्य विधानों के सकुशल संपन्न होने की कामना की जाती है।
विभिन्न परगनों के मांझी-चालकी होंगे शामिल
इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विधान के साक्षी बनने के लिए बस्तर के विभिन्न परगनों से आए मांझी, चालकी, सिरहा-गुनिया और दशहरा समिति के पारंपरिक पुजारी भारी संख्या में सिरहासार भवन में मौजूद रहेंगे।
बस्तर दशहरा की यही सबसे बड़ी खासियत है कि यह राजा-प्रजा, विभिन्न जनजातीय समाजों और लोक-आस्था को एक सूत्र में बांधता है। ‘डेरी गड़ाई’ की इस रस्म के साथ ही अब आने वाले दिनों में रथ निर्माण, काछनगादी, जोगी बिठाई और भीतर रैनी जैसी मुख्य रस्मों का मार्ग प्रशस्त हो गया है।