जगदलपुर । विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं, 75 दिनों की सबसे लंबी अवधि और विशालकाय लकड़ी के रथों के संचालन के लिए दुनियाभर में जाना जाता है। इस ऐतिहासिक पर्व की सबसे मुख्य विशेषता है — 8 पहियों वाला विशालकाय ‘विजय रथ’, जिसे आधुनिक तकनीकों या मशीनों से नहीं, बल्कि ग्रामीण कारीगरों के हाथों की सदियों पुरानी पारंपरिक कला से गढ़ा जाता है।

1. बस्तर में रथ परंपरा का इतिहास और आगमन
बस्तर में रथ चलाने की परंपरा लगभग 600 वर्ष से अधिक पुरानी है।
इतिहास: 15वीं शताब्दी में बस्तर के काकतीय वंश के राजा पुरुषोत्तम देव (महाराजा अन्नम देव के प्रपौत्र) जगन्नाथ पुरी की तीर्थयात्रा पर गए थे।
‘रथपति’ की उपाधि: उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर पुरी के गजपति राजा ने उन्हें ‘रथपति’ की उपाधि दी और 16 पहियों वाला एक विशाल रथ भेंट में दिया।
बस्तर में शुरुआत: जगदलपुर लौटने के बाद राजा पुरुषोत्तम देव ने मां दंतेश्वरी को समर्पित कर इस विशाल रथ परंपरा की शुरुआत की। सुविधा और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समय के साथ इन 16 पहियों को दो भागों में बांटा गया — 4 पहियों वाला ‘फूल रथ’ और 8 पहियों वाला ‘विजय रथ’।
2. रथ चलाने के पीछे की धार्मिक व सामाजिक मान्यता
यह पर्व रावण वध के बजाय आद्यशक्ति मां दंतेश्वरी और बस्तर की अधिष्ठात्री देवी-देवताओं की आराधना पर केंद्रित है।
छत्र परिक्रमा: रथ पर किसी राजा या इंसान की मूर्ति नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी का पवित्र छत्र और काछिन देवी का प्रतीक विराजित किया जाता है।
लोकतांत्रिक सद्भाव: रथ को किसी घोड़े या हाथी द्वारा नहीं, बल्कि हजारों की संख्या में पहुंचे आदिवासी श्रद्धालु (मुरिया, मारिया, भट्टरा, धुरवा समाज के लोग) मोटी रस्सियों से खींचते हैं। यह बस्तर के राजा और प्रजा के बीच अटूट एकता का प्रतीक है।

3. निर्माण में जुटे ग्रामीण कारीगर: बिना कील-कांटे की अनोखी कारीगरी
8 पहियों वाले विशाल रथ का निर्माण किसी आधुनिक इंजीनियरिंग से कम नहीं है, लेकिन इसे बिना किसी आधुनिक ड्राइंग, लोहे की कीलों या नट-बोल्ट के बनाया जाता है।

कार्य / जिम्मेदारीपारंपरिक समुदाय / गाँवनिर्माण विधि
काष्ठ शिल्प (झाड़-तराश)बेड़ाउमरगांव और झाड़उमरगांव के बेड़ा-झाड़ा कारीगरसाल और सागौन की लकड़ियों को केवल कुल्हाड़ी और बसुले से तराशते हैं।
पहियों का निर्माणबेड़ाउमरगांव के कारीगर8 विशाल पहियों की सटीक गोलाई और धुरी तैयार करते हैं।
रस्सियों का निर्माणकरनपाल और आसपास के ग्रामीणछिंद (ताड़) के पत्तों और छाल से मजबूत मोटी रस्सियाँ (रथ खींचने के लिए) बांटते हैं।
रथ संचालन व खींचनाकिलेपाल और आसपास के हजारों ग्रामीणविशालकाय विजय रथ को पूरे शहर में खींचकर परिक्रमा करवाते हैं।
4. कब होती है रथ परिक्रमा?
बस्तर दशहरा में दो प्रकार के रथों की परिक्रमा की जाती है, जिनका समय और क्रम पूर्वनिर्धारित रस्मों के अनुसार होता है:
4 पहियों वाला ‘फूल रथ’ (आश्विन शुक्ल द्वितीया से सप्तमी):
शुरुआत में 6 दिनों तक रोजाना शाम को फूल रथ की परिक्रमा जगदलपुर के गोल बाजार और सिरहासार चौक के आसपास की जाती है।
8 पहियों वाला ‘विजय रथ’ (आश्विन शुक्ल महाअष्टमी व महानवमी):
मावली परघाव और निशा जात्रा: अष्टमी की रात भीतर रस्म के बाद विशालकाय 8 पहियों वाले रथ की पूजा होती है।
विजय रथ परिक्रमा: महाअष्टमी और महानवमी (नवरात्रि के अंतिम दिनों) पर इस 8 पहियों वाले द्वि-स्तरीय रथ की भव्य परिक्रमा निकाली जाती है।
रत्नपुर/बाहर रस्म: इसके बाद रथ को कुम्हारपारा या नगर के बाहर ले जाया जाता है, जहां ‘रथ चोरी’ की पारंपरिक रस्म पूरी होती है और फिर मुड़िया दरबार के दिन इसे वापस लाया जाता है।
बस्तर का यह 8 पहियों वाला रथ न केवल स्थापत्य कला की अनोखी मिसाल है, बल्कि बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, सामूहिक श्रम और लोक-आस्था का जीवंत दस्तावेज है।
