डेस्क । विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं, प्रकृति प्रेम और लोक-आस्था का एक जीवंत महाकुंभ है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाले इस अनूठे पर्व में हर एक रस्म का अपना गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इसी कड़ी में रविवार को जगदलपुर से कुछ दूरी पर स्थित ग्राम सरगीपाल में पारंपरिक ‘बेल पूजा’ का विधान अत्यंत हर्षोल्लास और वैदिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ।

शिव-शक्ति का प्रतीक: ‘युग्म बेल’ की महिमा
सरगीपाल के प्राचीन बेल वृक्ष के समक्ष आयोजित इस रस्म का मुख्य आकर्षण प्राकृतिक रूप से एक साथ जुड़े ‘युग्म बेल’ (जोड़े में लगे फल) रहे। लोकमान्यता और धार्मिक आस्था के अनुसार, इन जुड़े हुए फलों को देवाधिदेव महादेव और आदिशक्ति मां पार्वती का साक्षात स्वरूप माना जाता है।
इस महत्वपूर्ण अनुष्ठान की शुरुआत एक दिन पूर्व ही इन फलों को ससम्मान निमंत्रण देकर लाल वस्त्र से आच्छादित करने के साथ हुई थी। रविवार को सुबह से ही ग्राम सरगीपाल में किसी बड़े वैवाहिक उत्सव जैसा मांगलिक माहौल देखने को मिला। ग्रामीण महिलाओं ने पारंपरिक लोकगीतों की गूंज के बीच हल्दी लगाकर इस उत्सव को बेहद भव्य रूप दिया।

गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति
इस ऐतिहासिक और पवित्र अनुष्ठान की गरिमा बढ़ाने के लिए बस्तर राजपरिवार के सदस्य एवं माटी पुजारी श्री कमलचंद भंजदेव विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने अपनी उपस्थिति से सभी परंपराओं का विधिवत और शास्त्रसम्मत निर्वहन सुनिश्चित किया। इसके साथ ही बस्तर सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष श्री महेश कश्यप भी इस अवसर पर मौजूद रहे, जिन्होंने पारंपरिक रीति-रिवाजों में सहभागिता निभाते हुए श्रद्धालुओं का उत्साहवर्धन किया। सैकड़ों की संख्या में पहुंचे स्थानीय ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इस आयोजन को और अधिक दिव्य बना दिया।

गाजे-बाजे के साथ दंतेश्वरी मंदिर आगमन
धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण होने के उपरांत, पेड़ से इस पवित्र युग्म बेल को अत्यंत सावधानी और श्रद्धा के साथ तोड़ा गया। इसके बाद पारंपरिक वाद्ययंत्रों, ढोल-नगाड़ों और गाजे-बाजे की थाप पर एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई। इस शोभायात्रा के माध्यम से पवित्र बेल को जगदलपुर के प्रसिद्ध मां दंतेश्वरी मंदिर लाया गया, जहां इसे विधि-विधान के साथ स्थापित किया गया।

सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत स्वरूप
बस्तर दशहरा से जुड़ी यह परंपरा सैकड़ों वर्ष पूर्व एक राजा को मिले दिव्य स्वप्न और शक्ति के आभास से शुरू हुई थी। आज भी आधुनिकता के इस दौर में बस्तर के लोग अपनी इस प्राचीन सांस्कृतिक गरिमा और अटूट लोक-आस्था को पूरी शिद्दत के साथ जीवंत रखे हुए हैं। सरगीपाल की यह बेल पूजा न केवल प्रकृति के प्रति बस्तरवासियों के आदर भाव को दर्शाती है, बल्कि समाज को एकजुट करने वाली उनकी सांस्कृतिक विरासत का एक मजबूत स्तंभ भी है।