जगदलपुर । छत्तीसगढ़ का बस्तर अपनी प्राचीन संस्कृति, अनूठी परंपराओं और बेजोड़ हस्तशिल्प के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। हाल ही में जगदलपुर स्थित ‘कला गुड़ी एक्सपीरियंस जोन’ में एक विदेशी पर्यटक के दौरे ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि बस्तर की लोककला सात समंदर पार के सैलानियों को भी अपनी ओर आकर्षित कर रही है। पारंपरिक शिल्पकला की यह चमक अब वैश्विक फलक पर अपनी एक अलग पहचान बना रही है।

सुदूर देशों तक पहुंच रही बस्तर की माटी की महक
बस्तर की जनजातीय कला सदियों से अपनी मौलिकता और जटिल नक्काशी के लिए प्रसिद्ध रही है। ‘आमचो बस्तर टूरिज्म’ पहल के तहत संचालित ‘बस्तर कला गुड़ी एक्सपीरियंस जोन’ में पहुंचे विदेशी मेहमान ने यहाँ की कलाकृतियों को बेहद करीब से निहारा।
- ढोकरा आर्ट (बेलमेटल): प्राचीन लास्ट-वैक्स तकनीक से बनने वाली धातु की इन मूर्तियों की बारीकी देखकर वे अचंभित रह गए।
- काष्ठ एवं बांस शिल्प: प्रकृति के करीब रहकर तैयार की गई लकड़ी और बांस की कलाकृतियों की सहजता ने उनका मन मोह लिया।
- रॉट आयरन (लोह शिल्प): बस्तर के लौह शिल्पकारों के हाथों का हुनर देखकर विदेशी पर्यटक ने मुक्त कंठ से इसकी प्रशंसा की और ‘थम्स-अप’ देकर अपनी संतुष्टि जाहिर की।
महिला सशक्तिकरण और ‘अनुवेद’ ब्रांड की सफलता
यह पूरा परिसर केवल कला प्रदर्शन का केंद्र नहीं है, बल्कि ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण का एक अनूठा मॉडल भी है।
- बिहान योजना का प्रभाव: राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के अंतर्गत विकसित ‘कला गुड़ी’ परिसर ने महिला स्व-सहायता समूहों की दीदियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया है।
- ‘अनुवेद’ ब्रांड: पर्यटक ने बस्तर के हुनर को अपने साथ सहेजकर ले जाने के लिए ‘अनुवेद’ ब्रांड के तहत तैयार उत्पादों की जमकर खरीदारी की।
- बिचौलियों से मुक्ति: इस सीधी बाजार व्यवस्था के कारण बीच के बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो चुकी है, जिससे ग्रामीण महिला कलाकारों को उनकी मेहनत का सीधा और उचित पारिश्रमिक मिल रहा है।
सांस्कृतिक आदान-प्रदान और यादगार पल
भ्रमण का समापन बेहद आत्मीय माहौल में हुआ। विदेशी मेहमान ने कला गुड़ी की टीम और स्व-सहायता समूह की महिलाओं के साथ एक यादगार ग्रुप फोटो खिंचवाई, जिससे पूरा परिसर उत्साह और गर्व के भाव से सराबोर नजर आया।
यह घटना इस बात का प्रमाण है कि जब स्थानीय हुनर को सही मंच और मंचन मिलता है, तो वह न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की सांस्कृतिक साख को भी चार चांद लगाता है। बस्तर की यह लोककला आने वाले समय में वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर एक नया मील का पत्थर साबित हो रही है।
