डेस्क । प्रकृति की मार जब इंसानी जिंदगी पर पड़ती है, तो वह केवल घर-बार नहीं उजाड़ती, बल्कि भविष्य की उम्मीदों को भी तहस-नहस कर देती है। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले से सामने आया एक मामला इन दिनों संवेदनशीलता की सभी सीमाओं को लांघते हुए व्यवस्था की बेरुखी की बानगी पेश कर रहा है। बस्तर के ग्राम पंचायत गुमडेल के आश्रित ग्राम कुरुषपाल, कौरपाल और कानापाल की महिलाएं इस वक्त दोहरी मार झेल रही हैं—एक तरफ बाढ़ ने उनके सिर से छत छीन ली, तो दूसरी तरफ सरकार से मिली राहत राशि से बैंक ने लोन की किस्तें काट लीं।

मूसलाधार बारिश और बाढ़ का कहर
कुछ समय पहले हुई मूसलाधार बारिश और बस्तर अंचल में आई भयंकर बाढ़ ने इन ग्रामीण इलाकों में भारी तबाही मचाई थी। कई कच्चे और गरीब परिवारों के मकान इस प्राकृतिक आपदा में ढह गए। घर के अंदर रखा अनाज, कपड़े और रोजमर्रा का जरूरी सामान या तो बह गया या पूरी तरह नष्ट हो गया। पलभर में परिवारों की बरसों की मेहनत मलबे में तब्दील हो गई।
मुआवजा राशि पर बैंक की कटौती: पीड़ित महिलाओं का दर्द
आपदा के इस मंजर के बाद शासन-प्रशासन की ओर से पीड़ित परिवारों की सुध ली गई और मकान क्षति के एवज में प्रति हितग्राही 1 लाख 30 हजार रुपये की मुआवजा राशि स्वीकृत कर उनके बैंक खातों में भेजी गई। यह राशि इन बेघर परिवारों के लिए तिनके के सहारे जैसी थी, जिससे वे दोबारा अपने आशियाने खड़े कर सकें।
लेकिन, इसके बाद जो हुआ उसने इन महिलाओं को पूरी तरह तोड़ दिया। भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की बड़ांजी शाखा द्वारा इन महिलाओं के खातों में आई मुआवजा राशि से बिना किसी पूर्व सूचना के लोन की किस्त के नाम पर पैसे काट लिए गए।
पीड़ित महिलाओं का कहना है कि उन्होंने अपनी आजीविका चलाने के लिए महिला स्वयं सहायता समूह के माध्यम से बकरी पालन और मछली पालन जैसे छोटे व्यवसायों के लिए बैंक से कर्ज लिया था। वे अपनी किस्तें भरने के लिए तैयार थीं, लेकिन आपदा की इस घड़ी में जब घर-गृहस्थी तबाह हो चुकी है, तब राहत के पैसों से इस तरह कटौती किया जाना पूरी तरह अमानवीय है। अब उनके पास घर दोबारा बनाने के लिए पर्याप्त राशि नहीं बची है।
त्रिपाल के नीचे बीत रहे हैं दिन
मुसीबतें यहीं खत्म नहीं हुईं। बाढ़ के तुरंत बाद प्रशासन ने बेघर हुए परिवारों को नजदीकी सरकारी स्कूल में ठहराया था, ताकि वे कुछ दिन सुरक्षित रह सकें। लेकिन अब स्कूलों में बच्चों की परीक्षाएं शुरू होने के कारण इन परिवारों को स्कूल खाली करना पड़ा है।
नतीजतन, छोटे-छोटे बच्चों और बुजुर्गों के साथ ये परिवार अब खुले आसमान के नीचे प्लास्टिक के त्रिपाल (टेंट) का सहारा लेकर जीने को मजबूर हैं। सिर पर छत नहीं है, हाथ में बची-कुची पूंजी बैंक काट चुका है, और ऊपर से मौसम की अनिश्चित मार—इन हालातों में इन परिवारों का जीवन दयनीय हो गया है।
कलेक्टर से न्याय की गुहार
इस गंभीर संकट से घिरी पीड़ित महिलाओं ने एकजुट होकर जिला कलेक्टर को एक लिखित आवेदन सौंपा है। उनकी मांग है कि बैंक द्वारा काटी गई राहत राशि को तुरंत उनके खातों में वापस लौटाया जाए। महिलाओं का तर्क है कि यह मुआवजा उन्हें विलासिता के लिए नहीं, बल्कि बाढ़ से ढहे उनके घरों को दोबारा खड़ा करने और परिवार को इस भीषण संकट से उबारने के लिए दिया गया है।
निष्कर्ष
बस्तर की इन महिलाओं की यह पीड़ा सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि उस संवेदनशीलता की परीक्षा है जिसकी उम्मीद हर पीड़ित नागरिक शासन, प्रशासन और वित्तीय संस्थानों से करता है। आपदा के वक्त राहत राशि पर इस तरह की गई कटौती से न केवल भरोसा टूटता है, बल्कि मानवीय संवेदनाएं भी आहत होती हैं। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में क्या संज्ञान लेता है और कब तक इन बेसहारा परिवारों के जख्मों पर मरहम लगाया जाता है।