डेस्क । विश्व प्रसिद्ध एवं 75 दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक बस्तर दशहरा की तैयारियां अब अपने चरम पर हैं। इस पावन पर्व की सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत को संजोए रखने के उद्देश्य से बस्तर के सांसद महेश कश्यप ने जगदलपुर स्थित सिरहासार भवन पहुंचकर रथ निर्माण कार्य में हिस्सा लिया और श्रमदान कर कारीगरों का उत्साहवर्धन किया।

पारंपरिक शिल्पकला और कारीगरों का सम्मान
सिरहासार भवन में चल रहे पारंपरिक विशाल रथ निर्माण स्थल पर पहुंचे सांसद महेश कश्यप ने खुद औजार उठाकर कारीगरों के साथ लकड़ी तराशने और रथ जोड़ने के काम में हाथ बंटाया।
इस अवसर पर उन्होंने बस्तर की लोक-कला और सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत रखने वाले झारउमरगांव के पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को वस्त्र वितरित कर उनका सम्मान किया।
“बस्तर दशहरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि हमारी अगाध आस्था, अनूठी शिल्पकला और समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। पीढ़ियों से इस परंपरा को पूरी निष्ठा से सहेजने वाले कारीगर ही इस ऐतिहासिक आयोजन की वास्तविक रीढ़ हैं।”
— महेश कश्यप (सांसद, बस्तर)
75 दिनों का अनूठा उत्सव और रथ निर्माण की महत्ता
बस्तर दशहरा अपनी 75 दिनों की लंबी अवधि और अनोखी रस्मों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इस पर्व की सबसे प्रमुख विशेषताओं में से एक विशालकाय लकड़ी के रथों का निर्माण है, जिसे बिना किसी आधुनिक कील-कांटे के, केवल पारंपरिक तरीकों और प्राकृतिक लकड़ियों के जोड़ से तैयार किया जाता है।

झाड़उमरगांव और बेड़मागांव के कारीगर दशकों से इस परंपरा को बिना किसी बदलाव के पूरी निपुणता के साथ निभाते आ रहे हैं।
सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने की पहल
सांसद द्वारा किए गए इस श्रमदान और सम्मान समारोह को स्थानीय स्तर पर बस्तर की पारंपरिक शिल्पकला को प्रोत्साहन देने और सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने की दिशा में एक सकारात्मक पहल माना जा रहा है।
दशहरा समिति और स्थानीय प्रशासन भी उत्सव को भव्य और सुरक्षित रूप से संपन्न कराने के लिए तैयारियों में जुटा हुआ है, ताकि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को बस्तर की अनूठी संस्कृति का सजीव अनुभव मिल सके।