जगदलपुर । दुनियाभर में अपनी अनोखी और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए विख्यात विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा एक बार फिर अपनी सांस्कृतिक समृद्धि के कारण चर्चा के केंद्र में है। आधुनिकता की अंधी दौड़ से कोसों दूर, बस्तर का यह अनूठा उत्सव राजा और प्रजा के बीच के आत्मीय संबंधों, सामाजिक समरसता और प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम की वह जीवंत दास्तान कहता है, जो दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलती।

हाल ही में संपन्न हुई ‘बाहर रैनी’ की रस्म और इसके साथ जुड़ी ‘रथ चोरी’ की अनोखी घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि बस्तर की संस्कृति केवल उत्सव नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और लोक-आस्था का एक जीवंत दस्तावेज है।
जब माड़िया आदिवासियों ने ‘चुरा लिया’ 8 चक्कों का विशाल रथ
बस्तर दशहरे की मुख्य प्राण, इसका आठ चक्कों वाला विशालकाय रथ है। परंपरा के अनुसार, जैसे ही ‘भीतर रैनी’ की रस्म पूरी होती है, माड़िया जनजाति के लोग इस विशाल रथ को चुपचाप खींचकर शहर की चहल-पहल से दूर लालबाग स्थित कुम्हड़ाकोट के घने जंगलों में छिपा देते हैं।

इसे महज़ एक चोरी नहीं, बल्कि राजा और प्रजा के बीच के उस संवाद, अपनापन और मान-मनौव्वल का प्रतीक माना जाता है, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है। यह अनूठी परंपरा यह दर्शाती है कि बस्तर में सत्ता और समाज के बीच कोई दूरी नहीं है, बल्कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
जंगलों में मान-मनौव्वल और आत्मीय संवाद
‘रथ चोरी’ के अगले दिन जैसे ही ‘बाहर रैनी’ की रस्म का आगाज़ हुआ, बस्तर राजपरिवार के सदस्य और स्थानीय प्रशासन के प्रतिनिधि उस खोए हुए रथ की तलाश में सीधे कुम्हड़ाकोट के जंगलों में जा पहुंचे।

यह दृश्य किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था, जहां राजशाही शानो-शौकत को दरकिनार कर राजपरिवार के सदस्य सीधे ग्रामीणों और माड़िया समाज के बीच उनकी कुटिया में पहुंचे। उन्होंने रूठे हुए समाज के लोगों को मनाया, आत्मीय बातचीत की और आपसी संवाद से दिलों की दूरियों को मिटा दिया। राजपरिवार और ग्रामीणों का यह मिलन इस बात का प्रमाण है कि बस्तर का जनजीवन लोक-मर्यादाओं और आपसी भाईचारे पर टिका हुआ है।

नवाखानी: पंगत में बैठी समरसता
सुलह और मान-मनौव्वल के इस खूबसूरत माहौल के बीच जंगल में ही पारंपरिक ‘नवाखानी’ का विशेष आयोजन किया गया।
- नई फसल के आगमन की खुशी में नए चावल से बनी खीर का नैवेद्य अर्पित किया गया।
- राजपरिवार के सदस्य श्री कमलचंद भंजदेव, सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष श्री महेश कश्यप, महापौर श्री संजय पाण्डे और आम ग्रामीणों ने एक साथ एक ही पंगत में बैठकर यह पावन प्रसाद ग्रहण किया।
यह सहभोज इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण था कि बस्तर में जात-पात और ऊंच-नीच के भेदों से परे केवल और केवल मानवता, लोक-संस्कृति और समरसता का साम्राज्य है।

राजमहल तक वापसी और रथ परिक्रमा का समापन
जंगल में नवाखानी और मान-मनौव्वल की रस्में पूरी होने के बाद, माड़िया समुदाय और राजपरिवार के सदस्य एक हो गए। इसके बाद पारंपरिक गाजे-बाजे, ढोल-नगाड़ों की थाप और गगनभेदी जयकारों के साथ उस विशालकाय रथ को दोबारा खींचकर राजमहल के सिंह द्वार तक लाया गया।
रथ के अपने गंतव्य पर पहुंचते ही बस्तर दशहरे की बहुप्रतीक्षित रथ परिक्रमा रस्म का विधिवत समापन हो गया।
निष्कर्ष
बस्तर दशहरा महज़ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आदिवासी संस्कृति, लोक-आस्था और जन-सहभागिता का एक महाकुंभ है। ‘रथ चोरी’ से लेकर ‘बाहर रैनी’ और ‘नवाखानी’ तक की ये परंपराएं हमें यह सिखाती हैं कि कैसे संवाद, प्रेम और आत्मीयता से बड़े से बड़े रिश्तों को और मजबूत किया जा सकता है। यह अनूठी संस्कृति आज भी बस्तर की माटी में सांस ले रही है और पूरी दुनिया को प्रेम और भाईचारे का अनमोल संदेश दे रही है।

बस्तर की इस समृद्ध लोक-संस्कृति और दशहरे के इन अद्भुत पलों के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आप कभी इस ऐतिहासिक उत्सव का हिस्सा बने हैं?