जगदलपुर / छत्तीसगढ़: नौ दिनों तक चले शक्ति की आराधना के पर्व यानी शारदीय/चैत्र नवरात्रि के समापन और विजयादशमी (दशहरा) के पर्व के ठीक अगले ही दिन शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक का एक अलग ही नजारा देखने को मिला। नवरात्रि के दौरान देवी पांडालों में गूंजने वाले मंत्रोच्चार, भजन और घंटे-घड़ियालों की ध्वनि के शांत होते ही, शहर की सरकारी शराब दुकानों के बाहर अचानक भारी भीड़ उमड़ पड़ी।
त्योहार के पावन दिनों में नौ दिनों तक संयम और सादगी भरा माहौल बनाए रखने के बाद, जैसे ही पाबंदियां और व्रत के बंधन समाप्त हुए, शौकीनों का हुजूम सीधे शराब दुकानों की ओर रुख करता नजर आया।

सुबह से ही लंबी कतारें, दुकानों पर भारी दबाव
नवरात्रि के दौरान धार्मिक और आध्यात्मिक माहौल के चलते शराब की दुकानें या तो बंद रहीं या फिर वहां सन्नाटा पसरा रहा। लेकिन व्रत और अनुष्ठान के संपन्न होते ही दुकानों के शटर खुलते ही खरीदारों की लंबी-लंबी कतारें लग गईं।
- लंबी कतारें: कई काउंटर्स पर स्थिति यह हो गई कि लोगों को अपनी बारी के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा।
- बिक्री में भारी उछाल: आबकारी विभाग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, त्योहार के तुरंत बाद के इस एक दिन में दुकानों पर सामान्य दिनों के मुकाबले रिकॉर्ड तोड़ भीड़ और बिक्री दर्ज की गई।
- सोशल मीडिया पर चर्चा: इस नजारे के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल होने लगे, जिस पर आम जनता और बुद्धिजीवियों की ओर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
विरोधाभास या सामान्य प्रवृत्ति? इस पर छिड़ी बहस
इस घटना ने एक बार फिर सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से एक तीखी बहस को जन्म दे दिया है।
“एक तरफ जहां नौ दिनों तक पूरा समाज मां दुर्गा की भक्ति में लीन होकर शुद्धता, संयम और अनुशासन का पालन करता है, वहीं पर्व खत्म होते ही इस तरह का सैलाब उमड़ पड़ना यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमारी सामाजिक प्राथमिकताओं और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं में कितना विरोधाभास है।” — एक स्थानीय नागरिक
दूसरी ओर, कुछ जानकारों का मानना है कि उत्सव के माहौल के बाद लोग अपने रोजाना के रूटीन और खान-पान की आदतों में लौट रहे हैं, जिसे केवल एक सामान्य सामाजिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
निष्कर्ष
त्योहार हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं जो हमें संयम, पवित्रता और अच्छे आचरण की प्रेरणा देते हैं। नवरात्रि के बाद का यह दृश्य समाज के एक वर्ग की वास्तविकता को जरूर उजागर करता है, लेकिन साथ ही यह इस बात का भी संकेत है कि पाबंदियां हटने के बाद लोग अपनी पुरानी दिनचर्या में कितनी तेजी से वापस लौटते हैं।