सरकारी कार्यालय में पूरे दिन बिकती रही शराब लोग जाम से जाम छलकाते रहे…नही पहुची पुलिस जानिए वजह और देखिये वीडियो…

डेस्क । भारत विविधताओं का देश है, जहाँ हर क्षेत्र की अपनी अनूठी जीवनशैली, परंपराएं और उत्सव मनाने के तरीके हैं। लेकिन जब बात छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक बस्तर दशहरे की आती है, तो यह दुनिया के बाकी सभी आयोजनों से बिलकुल अलग और खास नजर आता है। 75 दिनों तक चलने वाला यह विश्व प्रसिद्ध दशहरा केवल रावण वध का पर्व नहीं है, बल्कि यह यहाँ की जनजातीय संस्कृति, प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम और प्राचीन मान्यताओं का जीवंत महाकुंभ है।

​इस महापर्व के दौरान कई ऐसे पड़ाव और रस्में आती हैं, जो आधुनिक और बाहरी दुनिया के नजरिए से भले ही अनोखी लगें, लेकिन बस्तर के जन-जीवन और उनकी आस्था में इनका बहुत पवित्र स्थान है। ऐसी ही एक अनूठी और चर्चा का विषय बनने वाली परंपरा से जुड़ा है—महुआ शराब का बाजार, जो बस्तर दशहरे के खास अवसरों पर जगदलपुर में सजता है।

​परंपरा और आस्था का प्रतीक: मास-मदिरा

देश के अन्य हिस्सों में जहाँ शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों को पूर्णतः सात्विक माना जाता है और मांस-मदिरा के सेवन या बिक्री पर पूरी तरह पाबंदी होती है, वहीं बस्तर की लोक-संस्कृति इससे बिल्कुल जुदा रास्ता अपनाती है। बस्तर में मास और मदिरा (विशेषकर महुए से बनी पारंपरिक शराब) को केवल मनोरंजन या नशे का साधन नहीं, बल्कि दैनिक जीवन और धार्मिक अनुष्ठानों का अनिवार्य हिस्सा माना जाता है।

​बस्तर दशहरे की कई प्रमुख रस्मों में देवी-देवताओं को इसका भोग लगाया जाता है। स्थानीय मान्यता है कि इन पारंपरिक भोगों और अनुष्ठानों के जरिए ही दशहरा पर्व निर्विघ्न रूप से संपन्न होता है। यह परंपरा यहाँ की प्रकृति-पूजक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है, जहाँ महुआ इस क्षेत्र का कल्पवृक्ष माना जाता है।

​बाहर रैनी की रस्म और वन विभाग परिसर में सजने वाला ‘महुआ बाजार’

​बस्तर दशहरे की अत्यंत महत्वपूर्ण रस्मों में से एक है—‘बाहर रैनी’। इस विशेष दिन जगदलपुर शहर के बीचों-बीच एक ऐसा बाजार सजता है, जो शायद देश में कहीं और देखने को न मिले। यह बाजार किसी निजी स्थान पर नहीं, बल्कि बस्तर वन विभाग कार्यालय परिसर में लगता है, जिसे खुद जिला प्रशासन की औपचारिक अनुमति प्राप्त होती है।

जैसे ही बाहर रैनी की रस्म शुरू होती है, वन विभाग कार्यालय परिसर का यह मैदान एक पारंपरिक मेले में तब्दील हो जाता है। यहाँ महुए से बनी शराब का बाजार सजता है और बस्तरवासी बड़ी संख्या में इस परंपरा का हिस्सा बनते नजर आते हैं।

​सैलानियों के लिए आकर्षण और संस्कृति का सीधा अनुभव

इस अनूठे बाजार में केवल स्थानीय आदिवासी भाई-बहन ही नहीं, बल्कि देश-विदेश से बस्तर दशहरा देखने पहुंचे सैलानी भी बड़ी संख्या में शिरकत करते हैं। पर्यटकों के लिए यह दृश्य हैरान करने वाला और साथ ही बस्तर की मूल संस्कृति के बेहद करीब लाने वाला होता है। सैलानी यहाँ बस्तर की मिट्टी की महक से जुड़ी इस परंपरा को देखते हैं, महुए की महक के बीच बस्तर की आत्मीयता को महसूस करते हैं और इस महापर्व के अनूठे रंग में पूरी तरह डूब जाते हैं।

​निष्कर्ष

​बस्तर दशहरा यह सिखाता है कि संस्कृति कोई किताबी या स्थिर चीज नहीं है, बल्कि यह समय, प्रकृति और समाज के साथ जीने का एक जीवंत तरीका है। आधुनिकता के इस दौर में भी बस्तर ने अपनी मूल जड़ों, आदिवासी परंपराओं और पूर्वजों से मिली मान्यताओं को जिस सहजता और खुलेपन के साथ सहेज कर रखा है, वह वाकई मिसाल है। महुआ बाजार और बाहर रैनी की यह परंपरा सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर की आत्मा की वह खुली खिड़की है, जिससे यहाँ के जन-जीवन की सच्ची और बेबाक तस्वीर साफ दिखाई देती है।

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