डेस्क । बस्तर की माटी और यहाँ की प्राचीन कला-संस्कृति ने एक बार फिर वैश्विक और राष्ट्रीय पटल पर अपनी मजबूत दस्तक दी है। सदियों से अपनी अनूठी सुंदरता के लिए विख्यात बस्तर का पारंपरिक ढोकरा (बेलमेटल) शिल्प अब देश के चुनिंदा चुनिंदा प्रीमियम कला क्लस्टरों में शामिल होने जा रहा है।

हाल ही में, भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय की एक उच्च स्तरीय टीम ने जगदलपुर विकासखंड के प्रसिद्ध चिलकुटी गाँव का दौरा किया। जिला प्रशासन के समन्वय और कलेक्टर आकाश छिकारा के मार्गदर्शन में हुए इस दौरे ने बस्तर के शिल्पकारों के जीवन में नई उम्मीदों के द्वार खोल दिए हैं।
क्यों खास है बस्तर का ढोकरा शिल्प?
ढोकरा कला, जिसे ‘लॉस्ट वैक्स कास्टिंग’ (नष्ट मोम पद्धति) के नाम से भी जाना जाता है, धातु ढलाई की एक प्राचीन और बेहद जटिल तकनीक है। इसमें कारीगर मोम, मिट्टी और पीतल या कांसे का उपयोग कर बेहद खूबसूरत मूर्तियाँ, आभूषण और पारंपरिक कलाकृतियाँ तैयार करते हैं।

चिलकुटी गाँव के दौरे के दौरान केंद्रीय दल—जिसका नेतृत्व मंत्रालय के अवर सचिव डॉ. सुधीर कुमार, प्रोजेक्ट एसोसिएट सुश्री नौरिन शाहिद और क्लस्टर डेवलपमेंट एक्सपर्ट श्री जागेश्वर ने किया—ने इस पूरी प्रक्रिया को बेहद नजदीक से देखा। अधिकारियों ने कारीगरों से सीधे संवाद कर उनकी कला के हुनर और संघर्ष दोनों को गहराई से समझा।
मॉडल प्रीमियम क्लस्टर की एक-वर्षीय कार्ययोजना
जनजातीय कार्य मंत्रालय की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत चिलकुटी को एक समग्र मॉडल प्रीमियम क्लस्टर के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके लिए एक ठोस एक-वर्षीय कार्ययोजना तैयार की गई है, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- एकीकृत परिसर: एक ही छत के नीचे अत्याधुनिक ढोकरा मैन्युफैक्चरिंग यूनिट, मटेरियल स्टोर और इन्वेंट्री मैनेजमेंट सिस्टम स्थापित किया जाएगा।
- आधुनिक ब्रांडिंग और पैकेजिंग: उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ उन्हें आधुनिक बाजार की माँग के अनुरूप पैक और ब्रांड किया जाएगा।
- बस्तर कला गुड़ी एक्सपीरियंस जोन: इस जोन को एक सशक्त मार्केटिंग हब के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिससे स्थानीय शिल्पकारों की पहुँच सीधे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक सुनिश्चित हो सकेगी।
शिल्पकारों के जीवन में आएगा आर्थिक बदलाव
वन विभाग द्वारा कारीगरों के लिए तैयार किए गए सामुदायिक भवन में चल रही गतिविधियों का सूक्ष्म अवलोकन करने के बाद टीम ने माना कि बस्तर के शिल्पकारों के पास असीम प्रतिभा है। इस योजना के धरातल पर उतरने से न केवल बिचौलियों की भूमिका समाप्त होगी, बल्कि आदिवासी कलाकारों को उनकी कला का उचित मूल्य और वैश्विक पहचान भी मिलेगी।

बस्तर के जंगलों और हाथों से निकला यह पीतल-काँसे का जादू अब देश के कोने-कोने तक अपनी चमक बिखेरने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह पहल बस्तर की लोक-संस्कृति को संरक्षित करने के साथ-साथ स्थानीय आजीविका को भी एक नया संबल प्रदान करेगी।
