डेस्क । वर्ष 1987 में जब हिंदी सिनेमा के मूर्धन्य अभिनेता नाना पाटेकर बस्तर की धरा पर पहुंचे थे, तब उनका व्यक्तित्व केवल एक उभरते अभिनेता का नहीं, बल्कि कला, रंगमंच और जमीन से जुड़े एक संवेदनशील इंसान का था। बस्तर के वरिष्ठ रंगकर्मी जी.एस. मनमोहन द्वारा साझा की गई पुरानी तस्वीरों और स्मृतियों के जरिए नाना पाटेकर के उस पांच दिवसीय प्रवास की कई दिलचस्प और ऐतिहासिक परतें उधड़ती हैं।

1. फिल्म ‘आज का महाभारत’ और बस्तर का प्रवास
1987 में बन रही फिल्म ‘आज का महाभारत’ की शूटिंग के सिलसिले में नाना पाटेकर जगदलपुर पहुंचे थे। इस फिल्म यूनिट में उनके साथ दीप्ति नवल, सुरेश ओबेरॉय, भारत भूषण और नीता पुरी जैसे दिग्गज कलाकार भी शामिल थे। फिल्म के निर्देशक श्याम गुप्ता थे (जो सुभाष घई के सहायक निर्देशक रह चुके थे) और इसके सिनेमैटोग्राफर अशोक दाहंड थे, जिन्होंने बाद में ‘हुकूमत’ और ‘गदर’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में कैमरामैन के रूप में ख्याति पाई।
जगदलपुर प्रवास के दौरान नाना पाटेकर शहीद पार्क रोड स्थित गोयल भवन में ठहरे थे। उनकी सादगी का आलम यह था कि वे अक्सर एक खुली जीप खुद ड्राइव करके साथी कलाकारों के साथ लोकेशन के लिए निकलते थे।
2. प्रशासन की पाबंदी और ओडिशा सीमा पर शूटिंग
उन दिनों बस्तर में तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन द्वारा फिल्मों और वृत्तचित्रों (Documentaries) की शूटिंग पर पाबंदी लगाई गई थी। प्रशासनिक अनुमति न मिलने के कारण फिल्म यूनिट को वैकल्पिक रास्ता चुनना पड़ा।
फिल्म के दृश्यों को बस्तर से सटी ओडिशा सीमा पर स्थित धनपुंजी के पास चांदली और देवड़ा के जंगलों में शूट किया गया। इस फिल्म में बस्तर के स्थानीय रंगकर्मियों को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला, जिनमें आकाशवाणी के उद्घोषक व रंगकर्मी जी. श्याम, शहजाद रहीम और गौतम कुंडू ने छोटे लेकिन महत्वपूर्ण किरदार निभाए थे।
3. जगदलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में संवाद और विचार
अपने प्रवास के दौरान नाना पाटेकर जगदलपुर स्थित शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज (जो उस समय वर्तमान एयरपोर्ट के सामने की इमारत में संचालित होता था) के वार्षिक स्नेह सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।

वहां उन्होंने छात्रों और युवाओं को संबोधित करते हुए कला, संस्कृति, बस्तर की समृद्ध परंपरा और सिनेमा पर अपने विचार बेबाकी से रखे। बस्तर के कलाकारों और आम लोगों के साथ रंगमंच और आर्ट फॉर्म्स पर उनकी खुली चर्चाओं ने स्थानीय कला जगत पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
4. एक बहुमुखी कलाकार का व्यक्तित्व
नाना पाटेकर को मुख्य रूप से उनके अभिनय के लिए जाना जाता है, लेकिन वे एक उत्कृष्ट पेंटर भी रहे हैं। उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से फाइन आर्ट्स में डिप्लोमा किया था। मराठी थिएटर के एक स्थापित नाम रहे नाना पाटेकर को हिंदी सिनेमा के मंच तक लाने का मुख्य श्रेय दिवंगत महान अभिनेत्री स्मिता पाटिल को जाता है।
त्रासदी: अधूरी रह गई ‘आज का महाभारत’
तमाम बेहतरीन कलाकारों, तकनीकी दिग्गजों और स्थानीय सहयोग के बावजूद ‘आज का महाभारत’ फिल्म कभी सिनेमाघरों का मुंह नहीं देख सकी और अनरिलीज्ड रह गई। फिल्म भले ही पर्दे पर न आ पाई हो, लेकिन बस्तर के जंगलों, सड़कों और रंगकर्मियों के दिलों में नाना पाटेकर की सादगी, मिलनसारिता और कला के प्रति निष्ठा की यादें हमेशा के लिए दर्ज हो गईं।
बस्तर का कला जगत और वहां के रंगकर्मी आज भी नाना पाटेकर के उस आत्मीय जुड़ाव को बड़े सम्मान और श्रद्धा के साथ याद करते हैं।
