डेस्क । छत्तीसगढ़ के बस्तर (जगदलपुर) में आदिवासियों को स्थानीय स्तर पर रोजगार देने और वनोपज को नया बाजार दिलाने के सपने के साथ शुरू हुआ ‘ट्राईफूड पार्क’ आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। लगभग 30 हजार आदिवासी ग्रामीणों को रोजगार और आर्थिक स्वावलंबन देने का वादा करने वाली यह महत्वाकांक्षी योजना, 5 साल बीत जाने के बाद भी केवल कागजी दावों और राजनीतिक बयानों तक ही सिमट कर रह गई है।


करीब 8 करोड़ रुपये की लागत से बना यह पार्क न तो स्थानीय आदिवासियों को काम दे सका और न ही यहाँ वनोपज की एक भी प्रोसेसिंग यूनिट शुरू हो पाई।
सपनों का लोकार्पण और ज़मीनी हकीकत
पांच साल पहले जगदलपुर के सेमरा गांव में एक भव्य समारोह के दौरान इस ट्राईफूड पार्क का लोकार्पण किया गया था। बस्तर के वनांचल क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीणों को उम्मीद थी कि अब उनके द्वारा एकत्रित तेंदूपत्ता, महुआ, अमचूर, हर्र, बहेड़ा, इमली और सालबीज जैसी लघु वनोपजों को बिचौलियों के बजाय सीधे सही और उचित दाम पर खरीदा जाएगा। योजना यह थी कि स्थानीय स्तर पर ही प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर वनोपज का मूल्य संवर्धन (Value Addition) किया जाएगा, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा।
लेकिन आज की स्थिति बेहद निराशाजनक है:
- कर्मचारियों का अभाव: करोड़ों रुपये का यह विशाल परिसर महज एक माली, एक कर्मचारी और दो सुरक्षा गार्डों के भरोसे छोड़ दिया गया है।
- ठप गतिविधियां: परिसर में न तो वनोपज की खरीदी शुरू हुई है और न ही किसी तरह का प्रसंस्करण (Processing) काम हो रहा है।
- जर्जर होता ढांचा: सही देख-रेख और रख-रखाव के अभाव में करोड़ों की लागत से बना भवन धीरे-धीरे जर्जर और बदहाल हो रहा है।
आदिवासियों का आरोप: योजना बनी छलावा
सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर का कहना है कि आदिवासियों के विकास और उत्थान के नाम पर बनाई गई यह परियोजना धरातल पर एक बड़ा छलावा साबित हुई है। उनका कहना है कि:
”आज भी बस्तर के गरीब वनोपज संग्राहक अपनी मेहनत की उपज को बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों में बेचने को मजबूर हैं। जिस योजना को हमारे रोजगार के लिए शुरू किया जाना था, वह करोड़ों का ढांचा आज धूल फांक रहा है।”
आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक जवाब
इस मामले पर बस्तर के सांसद महेश कश्यप ने कहा कि यह प्रोजेक्ट पूर्ववर्ती सरकार की अकर्मण्यता और लापरवाही का शिकार हुआ है। उन्होंने विश्वास दिलाया है कि:
- केंद्र सरकार इस ट्राईफूड पार्क के संचालन को लेकर बेहद गंभीर है।
- पार्क के अब तक शुरू न हो पाने के तकनीकी व प्रशासनिक कारणों की पूरी जानकारी ली जाएगी।
- जल्द से जल्द सभी बाधाओं को दूर कर यहाँ वनोपज प्रसंस्करण (Food Processing) का कार्य शुरू कराया जाएगा, ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार से जोड़ा जा सके।
प्रशासन की चुप्पी और आदिवासियों की मजबूरी
ट्रायफेड (TRIFED) द्वारा तैयार किए गए इस इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर स्थानीय जिला प्रशासन के अधिकारी फिलहाल कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। प्रशासनिक उदासीनता का सीधा असर बस्तर के गरीब वनवासियों पर पड़ रहा है। लोकार्पण के 5 साल बाद भी पार्क के ताले न खुलने से ग्रामीण निराश हैं और मजबूरीवश अपनी बहुमूल्य वनोपज को बाहरी व्यापारियों को कम कीमतों में बेचने के लिए विवश हैं।
अब देखने वाली बात यह होगी कि बयानों और आश्वासनों के बीच अटका यह ट्राईफूड पार्क कब तक सच में आदिवासियों के लिए रोजगार और उम्मीद की नई किरण बन पाता है।