बस्तर में घटती कुपोषण की दर, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त बता रही है कि जंग अभी बाकी है

जगदलपुर । छत्तीसगढ़ का बस्तर ज़िला लंबे समय से कुपोषण की गंभीर चुनौती से जूझ रहा है। महिला एवं बाल विकास विभाग के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, बस्तर में कुपोषण की दर में बीते वर्षों की तुलना में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। राज्य गठन के समय जहाँ बस्तर में कुपोषण की दर 52 प्रतिशत थी, वहीं मार्च 2024 तक यह घटकर 22 प्रतिशत पर आई और अब यह गिरकर 17 प्रतिशत पहुँच गई है।

​इस सुधार के बावजूद, ज़मीनी धरातल पर स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। आंकड़ों का दूसरा पहलू यह दिखाता है कि बस्तर ज़िले में आज भी 13,700 से अधिक बच्चे कुपोषण की जकड़ में हैं।

​ज़िले की वर्तमान स्थिति और आंकड़े

  • ​कुल पंजीकृत बच्चे: बस्तर ज़िले के लगभग 2,000 आंगनबाड़ी केंद्रों में 81,000 बच्चे पंजीकृत हैं।
  • ​कुपोषित बच्चों की संख्या: पंजीकृत बच्चों में से 13,700 से अधिक बच्चे कुपोषित चिह्नित किए गए हैं।
  • ​सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र: ज़िले के बस्तानार, दरभा और बकावंड विकासखंडों में अन्य ब्लॉकों की तुलना में कुपोषण का प्रभाव सबसे अधिक है।
  • ​पड़ोसी ज़िले की स्थिति: अखिल राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) सर्वे के अनुसार, पड़ोसी ज़िले सुकमा में 57% से अधिक बच्चे कुपोषित हैं, जो पूरे अंचल की गंभीर स्थिति को दर्शाता है।

​कुपोषण के मुख्य कारण और चुनौतियाँ

​महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी मनोज सिंहा के अनुसार, विभाग कुपोषण की दर को कम करने के लिए लगातार प्रयासरत है। हालाँकि, इस लड़ाई में कई प्रशासनिक और स्थानीय चुनौतियाँ आड़े आ रही हैं:

  • ​बीमारियों का असर: बस्तर में मलेरिया और अन्य संक्रामक बीमारियों के प्रकोप के कारण बच्चों का स्वास्थ्य तेज़ी से गिरता है, जिससे वे आसानी से कुपोषण का शिकार हो जाते हैं।
  • ​आदिवासी आबादी पर प्रभाव: आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की स्थिति कुपोषण मामले में अभी भी बेहद संवेदनशील बनी हुई है।
  • ​कुपोषण के विविध रूप: बच्चों में कम वजन, दुबलापन (wasting), बौनापन (stunting) के साथ-साथ ‘अति गंभीर कुपोषित’ (SAM) श्रेणी की समस्या बनी हुई है।

​सवाल जो अब भी कायम हैं

​आंकड़ों में दर भले ही 52% से घटकर 17% पर आ गई हो, लेकिन हज़ारों बच्चों का कुपोषित होना यह सवाल उठाता है कि कुपोषण को जड़ से समाप्त करने के प्रयास ज़मीनी स्तर पर पूरी तरह प्रभावी क्यों नहीं दिख रहे हैं? देश के सर्वाधिक कुपोषित क्षेत्रों में बस्तर का नाम बने रहना यह संकेत देता है कि केवल पोषण आहार बांटना ही काफी नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छता और स्थानीय बीमारियों की रोकथाम पर एकीकृत रणनीति के साथ काम करने की तत्काल आवश्यकता है।

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