तीन साल का लंबा दर्द, एक घूंट पानी और छलके आंसू: कृत्रिम हाथ से मिली रोनू को स्वाभिमान की नई जिंदगी

जगदलपुर । हादसे पल भर में जिंदगी की रफ्तार थाम देते हैं, लेकिन जब तकनीक और संवेदनाएं एक साथ आ खड़ी हों, तो खोया हुआ आत्मविश्वास और उम्मीदें फिर से लौट आती हैं। जगदलपुर के धरमपुरा क्रीड़ा परिसर में आयोजित ‘निःशुल्क विशाल दिव्यांग उपकरण वितरण शिविर’ में कुछ ऐसा ही भावुक और प्रेरणादायी नज़ारा देखने को मिला, जहां मांझीगुड़ा निवासी रोनू के जीवन में तीन साल बाद फिर से उजाला हुआ।

​एक हादसे ने छीनी थी खुशियां

तीन साल पहले घर में चाय बनाते समय एक दर्दनाक हादसे में रोनू का हाथ आग की चपेट में आ गया था। घाव इतना गहरा था और संक्रमण इस कदर फैल चुका था कि डॉक्टरों को उनकी जान बचाने के लिए कोहनी तक हाथ काटना पड़ा। इस एक घटना ने रोनू की दुनिया बदल दी। जिस हाथ से वे अपने सारे काम करते थे, उसके दूर होते ही वे दैनिक कार्यों के लिए भी दूसरों पर निर्भर हो गए। आत्मनिर्भरता का छिन जाना उनके मनोबल पर गहरी चोट छोड़ गया था।

​क्रीड़ा परिसर में जगी उम्मीद की किरण

धरमपुरा का क्रीड़ा परिसर रोनू के लिए केवल एक शिविर नहीं, बल्कि नए जीवन का प्रवेश द्वार साबित हुआ। यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने उनके हाथ का सटीक नाप लेकर अत्याधुनिक कृत्रिम हाथ (प्रॉस्थेटिक आर्म) फिट किया। हाथ लगने के बाद जब डॉक्टरों ने उन्हें इसका उपयोग करना सिखाया, तो वहां मौजूद हर शख्स की सांसें थम सी गईं।

​जब रोनू ने खुद उठाया पानी का गिलास

कृत्रिम हाथ लगते ही रोनू ने बेहद आत्मविश्वास के साथ टेबल पर रखा गिलास उठाया और पानी पिया। तीन साल के लंबे इंतजार के बाद अपने हाथ के सहारे खुद पानी पीते देख रोनू की आंखें खुशी और भावुकता से छलक उठीं। उनके चेहरे पर आई चमक और सुकून ने शिविर में मौजूद परिजनों, डॉक्टरों और आयोजकों को भी भाव-विभोर कर दिया।

​”हाथ कटने के बाद मुझे लगता था कि मेरी जिंदगी रुक गई है और मैं कभी अपने हाथों से काम नहीं कर पाऊंगा। लेकिन आज खुद पानी पीकर ऐसा लगा जैसे मेरी खोई हुई जिंदगी और स्वाभिमान मुझे वापस मिल गए हों।” — रोनू

​उपकरण ही नहीं, स्वाभिमान लौटाने की पहल

शिविर आयोजकों का कहना है कि इस महाअभियान का उद्देश्य केवल कृत्रिम अंग या उपकरण बांटना नहीं है, बल्कि दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाकर समाज की मुख्यधारा में पूरे स्वाभिमान के साथ जोड़ना है।

आधुनिक चिकित्सा तकनीक और मानव सेवा के इस संगम ने यह साबित कर दिया है कि अगर प्रयास सच्चे हों, तो किसी की थमी हुई जिंदगी को फिर से मुस्कुराने की वजह दी जा सकती है।

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