डेस्क । राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले की परबतसर नगर पालिका चुनाव के नतीजों ने हर किसी को हैरान कर दिया है। चुनाव में कई तरह की हार-जीत देखने को मिलती है, लेकिन वार्ड नंबर 13 से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार कैलाश चंद्र और वार्ड नंबर 20 से राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के उम्मीदवार भंवरलाल के आंकड़े ने सबको चौंका दिया—दोनों ही प्रत्याशियों को महज 1-1 वोट मिला है।

सबसे ज्यादा चर्चा बीजेपी प्रत्याशी कैलाश चंद्र के 1 वोट को लेकर हो रही है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर एक राष्ट्रीय पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी सिर्फ एक वोट पर कैसे सिमट गया और उन्होंने उस वार्ड से चुनाव क्यों लड़ा जहाँ वे खुद को वोट तक नहीं दे सकते थे?
आखिर क्यों लड़ा उस वार्ड से चुनाव?
जांच और स्थानीय स्तर पर सामने आई वजहों के अनुसार इस ‘1 वोट’ के पीछे तीन मुख्य कारण रहे:
- पड़ोसी वार्ड के मतदाता होना: कैलाश चंद्र खुद वार्ड नंबर 13 के निवासी या मतदाता नहीं हैं; उनका नाम वार्ड नंबर 12 की मतदाता सूची में दर्ज है। चुनावी नियमों के तहत कोई भी नागरिक अपनी नगर पालिका क्षेत्र के किसी भी वार्ड से चुनाव लड़ सकता है, भले ही वह उस विशेष वार्ड का वोटर न हो। इसी वजह से कैलाश चंद्र वार्ड 13 में खुद को भी वोट नहीं डाल सके।
- पार्टी की ‘सिंबल वॉकओवर’ की मजबूरी: स्थानीय रणनीतिकारों के मुताबिक, वार्ड नंबर 13 में बीजेपी के पास कोई मजबूत स्थानीय चेहरा नहीं मिल रहा था। कांग्रेस प्रत्याशी को ‘निर्विरोध’ जीत से रोकने और सिर्फ कागजी औपचारिकता (खानापूर्ति) पूरी करने के लिए पार्टी संगठन ने पड़ोसी वार्ड 12 के कैलाश चंद्र को वार्ड 13 से टिकट थमा दिया।
- प्रस्तावकों और अपनों का भी साथ न मिलना: नामांकन के दौरान प्रस्तावक बनने वाले स्थानीय समर्थकों ने भी वोटिंग के दिन उनका साथ छोड़ दिया या फिर विरोधी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान कर दिया। इस वार्ड से कांग्रेस की हिना खानम को 376 वोट मिले और वे विजयी रहीं, जबकि कैलाश चंद्र के खाते में पूरे वार्ड से केवल 1 अनजान व्यक्ति का वोट आया।
RLP प्रत्याशी की भी फजीहत
इसी तरह वार्ड नंबर 20 से चुनाव लड़े RLP प्रत्याशी भंवरलाल का हश्र भी अलग नहीं रहा। स्थानीय स्तर पर जनाधार का दावा करने वाली पार्टी के उम्मीदवार को भी केवल 1 वोट नसीब हुआ, जिसने स्थानीय संगठन की जमीनी पकड़ पर सवालिया निशान लगा दिया है।
जमीनी हकीकत का आईना
परबतसर नगर पालिका का यह नतीजा राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ा सबक है। यह दिखाता है कि बिना स्थानीय जनाधार, बिना क्षेत्र का वोटर हुए और सिर्फ पार्टी सिंबल के भरोसे चुनाव मैदान में उतरना किसी प्रत्याशी और पार्टी के लिए कितना हास्यास्पद साबित हो सकता है।