‘प्रभारी’ व्यवस्था के जाल में उलझी छत्तीसगढ़ की स्कूली शिक्षा

रायपुर । छत्तीसगढ़ में स्कूली शिक्षा की नींव प्रशासनिक मोर्चे पर डगमगाती नजर आ रही है। राज्य के सरकारी हाई और हायर सेकेंडरी स्कूलों में शैक्षणिक तथा प्रशासनिक संतुलन बनाए रखने का सबसे मुख्य जरिया — प्राचार्य (हेडमास्टर) — खुद एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। राज्य के लगभग 70 प्रतिशत सरकारी स्कूल इस वक्त नियमित प्राचार्यों की जगह ‘प्रभारी प्राचार्यों’ के सहारे संचालित हो रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश के 2,632 स्कूलों में महज 772 नियमित प्राचार्य ही तैनात हैं, जबकि शेष 1,860 से अधिक स्कूलों की कमान वरिष्ठ व्याख्याताओं (Lecturers) को बतौर प्रभारी सौंपी गई है।

​यह कोई अस्थायी कमी नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित प्रशासनिक ढर्रे का रूप ले चुकी समस्या है, जो राज्य के शैक्षणिक ढाँचे को भीतर से प्रभावित कर रही है।

​अधिकारों की सीमा और फैसले लेने में हिचक

​प्रभारी व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना अधिकारों का सीमित होना है। कार्यवाहक प्राचार्यों के पास कई नीतिगत और वित्तीय फैसले लेने के पूर्ण अधिकार (DDO powers) नहीं होते या वे अत्यधिक कागजी प्रक्रियाओं में उलझे रहते हैं।

  • ​प्रशासनिक शिथिलता: स्कूल परिसर के बुनियादी रखरखाव, नए विकास कार्यों या आकस्मिक वित्तीय स्वीकृतियों के लिए प्रभारी प्राचार्यों को फाइलें उच्च अधिकारियों तक भेजनी पड़ती हैं, जिससे काम समय पर नहीं हो पाते।
  • ​दोहरी ज़िम्मेदारी की मार: वरिष्ठ व्याख्याताओं को प्राचार्य का पदभार संभालने के साथ-साथ अपने मुख्य विषय की कक्षाएं भी लेनी पड़ती हैं। दोहरी जिम्मेदारी के कारण वे न तो पूरे मन से अध्यापन पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं और न ही प्रशासनिक स्तर पर कड़े कदम उठा पाते हैं।

​बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी और गुणवत्ता पर असर

​प्राचार्य न केवल स्कूल का प्रशासनिक प्रमुख होता है, बल्कि वह शैक्षणिक सत्र का दिशा-निर्देश (Academic Roadmap) भी तय करता है। नियमित नेतृत्व के अभाव का सीधा असर बोर्ड परीक्षाओं (10वीं और 12वीं) के नतीजों और छात्रों की तैयारी पर पड़ रहा है।

  • ​निगरानी में कमी: कक्षाओं का नियमित निरीक्षण, कमजोर छात्रों के लिए रेमेडियल कक्षाओं की योजना और शिक्षकों की उपस्थिति व प्रदर्शन पर जवाबदेही तय करना प्रभारियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
  • ​शिक्षकों में तालमेल का अभाव: प्रभारियों के पास सहकर्मियों पर सीधे प्रशासनिक नियंत्रण या अनुशासनात्मक कार्रवाई के अधिकार सीमित होते हैं, जिससे स्कूल स्टाफ के बीच अनुशासन बनाए रखना कठिन साबित होता है।

​पदोन्नति और भर्ती की धीमी प्रक्रिया

​इस संकट की मुख्य वजह शिक्षा विभाग में विभागीय पदोन्नति (DPC) की प्रक्रिया में हो रही देरी और सीधी भर्ती में आ रही कानूनी-प्रशासनिक अड़चनें हैं। व्याख्याता से प्राचार्य पद पर पदोन्नति की सूची समय पर जारी न होने से रिक्त पड़े पद लगातार बढ़ते गए और विभाग को अस्थायी समाधान के तौर पर प्रभार सौंपने की नीति अपनानी पड़ी।

​आगे का रास्ता

​सरकारी स्कूलों में सिर्फ इमारतों और सुविधाओं को सुधारने से शिक्षा का स्तर नहीं सुधरेगा; उसके लिए मजबूत और सशक्त प्रशासनिक नेतृत्व अनिवार्य है।

  • ​त्वरित पदोन्नति: शिक्षा विभाग को प्राथमिकता के आधार पर विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की बैठकें कर पात्र व्याख्याताओं को नियमित प्राचार्य के पद पर पदोन्नत करना चाहिए।
  • ​वित्तीय अधिकार: जब तक नियमित नियुक्तियाँ नहीं होतीं, तब तक कार्यवाहक प्राचार्यों को तात्कालिक नीतिगत और वित्तीय शक्तियाँ प्रदान की जाएं ताकि स्कूल संचालन बाधित न हो।

यदि राज्य सरकार छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में सुधार चाहती है, तो उसे ‘प्रभारी संस्कृति’ को समाप्त कर पूर्णकालिक, सशक्त और जिम्मेदार प्राचार्यों की तैनाती तुरंत सुनिश्चित करनी होगी।

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