जगदलपुर । हरियाली अमावस्या के साथ ही बस्तर में विश्व विख्यात दशहरे पर्व की शुरुआत हो गई है बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी मंदिर के प्रांगण में पूरे विधि विधान से पूजा अर्चना कर पाट जात्रा रस्म पुरी की गई इस रश्म में बस्तर दशहरे के लिए तैयार किए जाने वाले रथ निर्माण की पहली लकड़ी की पूजा की जाती है ….नियम यह है की हरियाली अमावस्या के दिन इस लकड़ी की विशेष परंपरा अनुसार पूजा की जाती है जिसमें समाज के प्रमुख एवं रथ के कारीगर इस पूजा विधान को संपन्न करते हैं विशेष जगह से चिन्हित कर यह पहले लकड़ी मंगाई जाती है परंपरा अनुसार हर दशहरे पर्व पर बिलोरी ग्राम से लकड़ी का चयन कर लाया जाता है हरियाली अमावस्या के पूजा संस्कार के बाद इस लकड़ी को बाहर निकाल कर फिर पूजा विधान किया जाता है और इसके बाद बस्तर दशहरे की शुरुआत होती है 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा पर्व की यह पहली रस्म है जिसके साथ ही दशहरे की तैयारी गांव में शुरू कर दी जाती हैं ऐतिहासिक तौर पर दशहरे पर्व से जुड़े विभिन्न समाज के प्रतिनिधि आज भी इस पर्व की तैयारी कई महीनो तक करते हैं यही वजह है कि विभिन्न समाज के लोगों के प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग रस्म में दशहरे पर्व में दिखाई देती हैं और यहां पर वह 75 दिनों तक चलता है…..
पाट जात्रा रस्म के बाद 24 सितम्बर को डेरी गड़ाई पूजा विधान, 10 अक्टूबर को काछनगादी पूजा विधान, 11 अक्टूबर को कलश स्थापना पूजा विधान, 12 अक्टूबर को जोगी बिठाई पूजा विधान सहित 13 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक प्रतिदिन नवरात्रि पूजा एवं रथ परिक्रमा पूजा विधान, 18 अक्टूबर को सुबह 11 बजे बेल पूजा, 19 अक्टूबर को महाअष्टमी पूजा विधान एवं निशा जात्रा पूजा विधान, 20 अक्टूबर को कुंवारी पूजा विधान, जोगी उठाई पूजा विधान एवं मावली परघाव, 21 अक्टूबर को भीतर रैनी पूजा विधान एवं रथ परिक्रमा पूजा विधान, 22 अक्टूबर को बाहर रैनी पूजा विधान एवं रथ परिक्रमा पूजा विधान, 23 अक्टूबर को सुबह काछन जात्रा पूजा विधान के पश्चात दोपहर में मुरिया दरबार का आयोजन होगा। वहीं 24 अक्टूबर को कुटुम्ब जात्रा पूजा विधान में बस्तर के अलग अलग गांवों से आए देवी-देवताओं की विदाई की जाएगी और 27 अक्टूबर को मावली माता की डोली की विदाई पूजा विधान के साथ ऐतिहासिक बस्तर दशहरा पर्व सम्पन्न होगी।

