दंतेवाड़ा । बस्तर आज भी उस विकास के लिए तरस रहा है जिसको करने का दावा हर पांच साल में हर पार्टी आदिवासियों के वोटो के लिए करती आ रही है ….पहले नक्सलवाद एक बड़ा बहाना हुआ करता था पर अब नक्सलियों के खात्मे की घोषणा के बावजूद सरकार बस्तर के आदिवासियों तक अपने दावों वाला विकास नहीं पहुंचा पा रही है और आज भी बस्तर के आदिवासी बीमार होने पर या किसी महिला के गर्भवती होने पर एम्बुलेंस से नहीं बल्कि पैदल खाट पर नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पहुंचते है…
ताजा मामला दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर दूर बालपेट के पटेलपारा का है जहाँ बारिश के दिनों में खाट ही एंबुलेंस बन जाती है क्योंकि गांव तक पक्की सड़क नहीं है ऐसे में एम्बुलेंस गांव तक कैसे पहुंचेगी जिसकी वजह से गंभीर मरीजों को खाट पर लिटाकर करीब दो किलोमीटर तक पैदल ले जाना पड़ता है।
बारिश कही सुखद तो कही आफ़त
जिला मुख्यालय से दसो किलोमीटर दूर नहीं हम बात कर रहे है महज 5 किलोमीटर दूर गांव बालपेट के पटेलपारा का ….5 किलोमीटर दूर होने पर भी अभी तक बालपेट के ग्रामीण सड़क के लिए तरस रही है इन ग्रामीणों की एक ही गलती है कि उनके क्षेत्र में कोई खदान या प्राकृतिक संसाधन नहीं है जिसकी लालच में सरकार चौड़ी चौड़ी सड़क निर्माण करें… बारिश के दिनों में कच्चा रास्ता कीचड़ और दलदल में तब्दील हो जाता है। ऐसे में एंबुलेंस चालक गांव के अंदर वाहन ले जाने से मना कर देते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, चालकों को एंबुलेंस के कीचड़ में फंसने का डर रहता है। इसके बाद मरीज के परिजनों और ग्रामीणों के सामने एक ही रास्ता बचता है—बीमार व्यक्ति को खाट पर लिटाकर कंधों के सहारे बालूद गांव तक पहुंचाना। ग्रामीणों के अनुसार बालूद तक करीब दो किलोमीटर का रास्ता है, जहां से एंबुलेंस मरीज को अस्पताल ले जाती है।
अब तो ग्रामीणों ने इसे अपनी किस्मत ही मान लिया है क्योंकि सालों से सड़क की मांग करने के बावजूद सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंग रही है…..पहली नक्सली बाधा बने हुए थे और अब सरकार की अनदेखी ग्रामीणों की उमीद तोड़ रही है…