​मनरेगा ने संवारी पदमा नाग की राह: पक्के पशु शेड ने दी ग्रामीण आजीविका को नई उड़ान

जगदलपुर । महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) आज ग्रामीण भारत के लिए केवल मजदूरी का जरिया नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव बन चुकी है। बस्तर जिले के जनपद पंचायत जगदलपुर अंतर्गत ग्राम पंचायत टोड़ापाल के सिरहापारा की रहने वाली पदमा नाग की सफलता की कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे सही सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से एक ग्रामीण परिवार की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल सकती हैं।

​पारंपरिक खेती से पशुपालन तक का संघर्ष

​पदमा नाग का परिवार पीढ़ियों से पूरी तरह से वर्षा आधारित पारंपरिक कृषि पर निर्भर था। आजीविका को बेहतर संबल देने के लिए उन्होंने पशुपालन की शुरुआत तो की, लेकिन संसाधनों के आभाव में उनके पास मवेशियों के लिए कोई पक्का शेड नहीं था।

​परिणामस्वरूप, भीषण गर्मी, कड़ाके की ठंड और बरसात के मौसम में जलभराव व कीचड़ के बीच बेजुबान मवेशियों को खुले आसमान के नीचे रहना पड़ता था। खुले में रहने के कारण पशु अक्सर मौसमी बीमारियों की चपेट में आ जाते थे और हमेशा उनकी सुरक्षा व चोरी होने का भय बना रहता था, जिससे पदमा का परिवार लगातार आर्थिक और मानसिक तनाव झेल रहा था।

​मनरेगा ने दिखाई उम्मीद की राह

​इस विकट समस्या के समाधान के लिए पदमा नाग ने हिम्मत जुटाई और ग्राम सभा की बैठक में अपनी बात मजबूती से रखी। उन्होंने मवेशियों के लिए पक्के पशु शेड के निर्माण की मांग की। ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों और ग्राम रोजगार सहायक के सकारात्मक सहयोग से सभी औपचारिकताएं पूरी की गईं और प्रस्ताव जनपद पंचायत जगदलपुर के कार्यक्रम अधिकारी के पास स्वीकृति के लिए भेजा गया।

​प्रशासनिक स्वीकृति मिलने के बाद वित्तीय वर्ष 2025-26 के तहत इस महत्वाकांक्षी कार्य की शुरुआत हुई। इस शेड की स्वीकृत राशि 1.49 लाख रुपये थी, जिसे बेहद कुशलता और मितव्ययिता के साथ मात्र 1.23 लाख रुपये की लागत से समय पर पूर्ण करा लिया गया।

​आजीविका में वृद्धि और जैविक खेती की शुरुआत

​पक्का और सुरक्षित शेड मिलने के बाद पदमा नाग के जीवन में सकारात्मक बदलावों का दौर शुरू हुआ:

  • ​पशुओं की संख्या में इजाफा: जहां पहले परिवार के पास केवल 2 पशु थे, वहीं अब सुरक्षित और पर्याप्त जगह होने के कारण वे 8 मवेशियों का बेहतरीन तरीके से पालन कर रहे हैं।
  • ​बढ़ी आमदनी: पशुओं के स्वस्थ रहने से दूध के उत्पादन में भारी सुधार हुआ है, जिससे परिवार की आय बढ़ी है। अब वे भविष्य में बकरी और मुर्गी पालन का विस्तार करने की योजना भी बना रहे हैं।
  • ​जैविक खेती की ओर कदम: मवेशियों के गोबर की पर्याप्त उपलब्धता के कारण पदमा नाग के परिवार ने महंगे रासायनिक खादों का उपयोग पूरी तरह छोड़कर जैविक खेती अपना ली है, जिससे लागत घटने के साथ मिट्टी की उर्वरता भी सुरक्षित हुई है।

​ग्रामीण विकास का प्रेरणास्त्रोत बना टोड़ापाल

​आज पदमा नाग का यह पशु शेड पूरे टोड़ापाल गांव और आसपास के क्षेत्र के लिए एक मिसाल बन गया है। इस सफलता ने साबित कर दिया है कि मनरेगा सिर्फ अकुशल रोजगार सृजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण करके स्थायी आजीविका और आत्मनिर्भरता के द्वार खोले जा सकते हैं।

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