दुनिया के सबसे लंबे उत्सव में रहस्यमयी ‘निशा जात्रा’ का विधान पूरा, बुरी शक्तियों से रक्षा के लिए होती है यह पूजा…देखिये वीडियो

डेस्क । बस्तर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर पूरी दुनिया में अपनी अनूठी परंपराओं के लिए जानी जाती है। इसी कड़ी में विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के अंतर्गत एक बेहद महत्वपूर्ण और रहस्यमयी रस्म ‘निशा जात्रा’ को पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ संपन्न किया गया।

​आइए इस प्राचीन और अनूठी परंपरा के हर एक पहलू पर विस्तार से नजर डालते हैं:

​क्या है निशा जात्रा रस्म?

बस्तर दशहरा के दौरान होने वाली निशा जात्रा की रस्म को स्थानीय मान्यताओं और परंपराओं में ‘काले जादू की रस्म’ भी कहा जाता है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो प्राचीन काल में इस अनुष्ठान का बहुत बड़ा सामरिक और आध्यात्मिक महत्व था। बस्तर के राजा-महाराजा अपने राज्य, उसकी सीमाओं और प्रजा की बुरी प्रेत-आत्माओं, नकारात्मक ऊर्जाओं तथा बाहरी आपदाओं से रक्षा के लिए इस विधान को निभाते थे। समय बदलने के साथ आज भी यह परंपरा अपनी उसी मूल भावना और पवित्रता के साथ जीवित है।

​12 गांवों के राउत तैयार करते हैं भोग प्रसाद

​इस प्राचीन परंपरा का निर्वहन करने के लिए विशेष तैयारियां की जाती हैं। सालों से चली आ रही प्रथा के अनुसार, निशा जात्रा के इस विशेष विधान को पूरा करने के लिए 12 गांवों के राउत मिलकर माता के लिए विशेष भोग प्रसाद तैयार करते हैं। यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से पारंपरिक नियमों और शुचिता के साथ संपन्न होती है।

​राज परिवार की उपस्थिति और विशेष पूजा-अर्चना

​निशा जात्रा की मुख्य रस्म देर मध्य रात्रि को विधि-विधान के साथ शुरू हुई। परंपरा का पालन करते हुए राज परिवार के प्रमुख सदस्य अनुपमा चौक स्थित गुड़ी पहुंचे।

  • ​राज परिवार के सदस्यों ने मंदिर के पुजारियों की उपस्थिति और मार्गदर्शन में अनुष्ठान में हिस्सा लिया।
  • ​यहां लगभग 1 घंटे तक पूरी निष्ठा के साथ विशेष पूजा-अर्चना की गई।
  • ​इस दौरान पारंपरिक मंत्रोच्चार और देव-आराधना से पूरा वातावरण भक्तिमय और रहस्यमयी नजर आया।

​बस्तर दशहरा की पहचान

​75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला उत्सव माना जाता है। इसमें हर एक दिन एक नई रस्म और संस्कृति की एक अलग झलक देखने को मिलती है। निशा जात्रा जैसी रस्में न सिर्फ बस्तर के गौरवशाली इतिहास को जीवंत रखती हैं, बल्कि यह आदिवासी संस्कृति और राजपरिवार की परंपराओं के अटूट रिश्ते का भी प्रतीक हैं। यह आयोजन आज भी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और पूर्वजों की संस्कृति से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम बना हुआ है।

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