जगदलपुर (बस्तर)। देश के विभिन्न राज्यों में सरकारी स्कूलों की बदहाल शिक्षा व्यवस्था को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। अब छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले से भी एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने शासन-प्रशासन के दावों की पोल खोल कर रख दी है। जगदलपुर के आड़ावाल स्थित शासकीय दृष्टि एवं श्रवण बाधित विद्यालय के मासूम दिव्यांग छात्र-छात्राओं ने शिक्षकों की भारी कमी और घटिया व्यवस्थाओं के विरोध में सड़क पर उतरकर मोर्चा खोल दिया है।
अपनी मांगों की सुनवाई न होने से नाराज बच्चों ने आड़ावाल बायपास रोड पर ही चटाई बिछा दी और चक्काजाम कर प्रदर्शन करने लगे। मासूम दिव्यांग बच्चों के सड़क पर बैठने की खबर फैलते ही प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया।

क्या हैं बच्चों के प्रमुख आरोप और समस्याएं?
दृष्टि एवं श्रवण बाधित विद्यालय के छात्रों का कहना है कि वे लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं:
- व्याख्याताओं को हटाना और पढ़ाई का नुकसान: बच्चों के अनुसार, पिछले साल शिक्षा विभाग की ओर से स्कूल में 5 व्याख्याता भेजे गए थे। लेकिन 4 मई को उन्हें अचानक हटा दिया गया। तब से लेकर आज तक नए व्याख्याताओं की पदस्थापना नहीं की गई, जिससे मुख्य विषयों की पढ़ाई पूरी तरह ठप पड़ी है।
- अमानक व घटिया भोजन: छात्रों का आरोप है कि उन्हें स्कूल में बेहद घटिया स्तर का खाना परोसा जाता है, जो उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
- वादों की वादाखिलाफी: इससे पहले भी अगस्त महीने में बच्चे अपनी इन्हीं मांगों को लेकर पैदल कलेक्ट्रेट कार्यालय पहुंचे थे। उस समय अधिकारियों ने जल्द व्यवस्था सुधारने का आश्वासन देकर बच्चों को वापस भेज दिया था। लेकिन तीन महीने बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।
प्रशासनिक अधिकारियों का रवैया: केवल ‘समझाइश’ और ‘अनभिज्ञता’
सड़क पर बच्चों के चक्काजाम की खबर मिलते ही तहसीलदार राहुल गुप्ता और समाज कल्याण विभाग की अधिकारी सुचित्रा लकड़ा आनन-फानन में मौके पर पहुंचे और बच्चों को समझाने का प्रयास करने लगे।
“शिक्षकों की कमी है और इस संबंध में वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दे दी गई है। बच्चों से बातचीत कर उन्हें समझाने का प्रयास किया जा रहा है।”
— सुचित्रा लकड़ा, अधिकारी (समाज कल्याण विभाग)
वहीं, मौके पर पहुंचे तहसीलदार राहुल गुप्ता ने कहा कि “बच्चे क्यों प्रदर्शन कर रहे हैं, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं है; बच्चों से बात कर उन्हें शांत कराया जा रहा है।”
प्रशासनिक अधिकारियों के इस बयान से साफ जाहिर होता है कि तीन महीने पहले कलेक्ट्रेट में दिए गए आश्वासन के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी बच्चों की समस्याओं को लेकर कितने बेपरवाह रहे हैं।

सवाल प्रशासन की संवेदनहीनता पर
जो मासूम बच्चे देख या सुन नहीं सकते, उन्हें अपनी जायज मांगों (शिक्षा और सम्मानजनक भोजन) के लिए बार-बार सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। तीन महीने पहले कलेक्ट्रेट में मिले आश्वासन का खोखला साबित होना और प्रशासनिक अधिकारियों का यह कहना कि ‘उन्हें प्रदर्शन की वजह मालूम नहीं’, तंत्र की गंभीर सुस्ती और संवेदनहीनता को दर्शाता है।
अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन इस प्रदर्शन के बाद जागता है या फिर इन विशेष बच्चों को केवल नया आश्वासन देकर शांत करा दिया जाता है।
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