जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की भव्यता सिर्फ उसके विशालकाय रथ और धार्मिक रस्मों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी असली खूबसूरती उस जन-भागीदारी और लोक-समर्पण में बसती है, जो पर्दे के पीछे रहकर इस ऐतिहासिक पर्व को जीवंत बनाए रखती है। इसी परंपरा और कृतज्ञता को नमन करते हुए सिरहासार भवन में एक बेहद भावुक और आत्मीय दृश्य देखने को मिला, जहां आस्था और सम्मान का अद्भुत संगम नजर आया।
सिरहासार भवन में ‘न्यौता भोज’ का भव्य आयोजन
गंगानगर वार्ड की सेवानिवृत्त शिक्षिका श्रीमती मनकुंवर सोनी ने अपने पूरे परिवार के साथ मिलकर बस्तर दशहरा के विशालकाय रथ का निर्माण करने वाले पारंपरिक शिल्पकारों के लिए ‘सेवा जोहार’ कार्यक्रम का आयोजन किया।
दिन-रात पसीना बहाकर और कठिन परिश्रम से ऐतिहासिक रथ को आकार देने वाले इन हुनरमंद कारीगरों के सम्मान में श्रीमती सोनी ने सिरहासार भवन में एक गरिमामय न्यौता भोज रखा। उन्होंने स्वयं अपने हाथों से सभी झाड़ू-बढ़ई और शिल्पकारों को भोजन परोसा।
”जो हाथ बस्तर की पहचान गढ़ते हैं, उनकी सेवा ही सच्ची पूजा”
अपने उद्गार व्यक्त करते हुए श्रीमती मनकुंवर सोनी ने कहा:
“यह भोज किसी औपचारिक परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि मेरी अंतरात्मा से उपजी श्रद्धा और कृतज्ञता का प्रतीक है। जो हाथ बस्तर की ऐतिहासिक पहचान और संस्कृति को गढ़ते हैं, उनकी सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।”
उपहार स्वरूप बांटे गए कंबल
कार्यक्रम का समापन अत्यंत भावुक क्षणों के साथ हुआ। भोजन के उपरांत श्रीमती सोनी और उनके परिजनों ने सभी बढ़ई कारीगरों व सहयोगियों को सम्मानपूर्वक कंबल भेंट किए। आने वाली ठंड से पहले मिला यह स्नेह और उपहार पाकर शिल्पकारों के चेहरों पर खुशी और सुकून की चमक साफ देखी जा सकती थी।

बस्तर की ऐतिहासिक धरोहर को संजोने वाले इन गुमनाम नायकों के प्रति एक पूर्व शिक्षिका का यह निस्वार्थ सम्मान न केवल स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा की एक अनूठी मिसाल भी पेश कर रहा है।