रथ निर्माण के लिए पेड़ काटने पर भड़का विरोध, ग्रामीणों ने उठाई परंपरा और पर्यावरण के संतुलन की मांग

बस्तर । 75 दिनों तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे का आगाज हो चुका है। पाटजात्रा, डेरी गढ़ई और बारसी उतारनी की प्रमुख रस्मों के बाद दशहरा समिति विशालकाय पारंपरिक रथ निर्माण की तैयारियों में जुट गई थी। हालांकि, इस बार रथ निर्माण के लिए लकड़ी काटने की प्रक्रिया को लेकर दरभा के जंगलों में विरोध की आवाज बुलंद हो गई है।

​साल (सखुआ) की लकड़ी लेने पहुंचे दशहरा समिति के सदस्यों और अधिकारियों को स्थानीय ग्रामीणों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। ग्रामीणों ने केवल लकड़ी काटने का विरोध ही नहीं किया, बल्कि अपनी 8 सूत्रीय मांगों को लेकर नेशनल हाईवे-30 पर घंटों चक्का जाम रखा, जिससे सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। बाद में तहसीलदार और वन विभाग के अधिकारियों की मध्यस्थता व आश्वासन के बाद प्रदर्शन समाप्त हुआ।

​पर्यावरण संरक्षण बनाम परंपरा

​ग्रामीणों का तर्क है कि हर साल विशालकाय रथ के निर्माण में दर्जनों कीमती पेड़ों की बलि दे दी जाती है, जिससे जंगल लगातार सिमटते जा रहे हैं। प्रशासन द्वारा किए जाने वाले पौधरोपण पर सवाल उठाते हुए ग्रामीणों ने कहा कि नए पौधे पेड़ बनने से पहले ही नष्ट हो जाते हैं।

​पर्यावरण और परंपरा के बीच संतुलन बनाने के लिए ग्रामीणों ने प्रशासन के समक्ष प्रमुख सुझाव और मांगें रखी हैं:

  • ​रथ का बहुवर्षीय उपयोग: हर साल नया रथ बनाने के बजाय एक बार बने रथ का इस्तेमाल 3 से 5 वर्षों तक किया जाए। पूरी तरह खराब होने पर ही नया रथ बने।
  • ​सांकेतिक वृक्ष कटाई: हर साल रस्म और परंपरा को जीवित रखने के लिए जंगल से केवल एक लकड़ी ही काटी जाए।
  • ​वैज्ञानिक पौधरोपण व सुरक्षा: पौधरोपण जून के महीने में किया जाए ताकि बारिश के पानी से पौधों की जड़ें मजबूत हो सकें। साथ ही, पौधे के पेड़ बनने तक उसकी देखरेख के लिए चौकीदार की व्यवस्था की जाए।

​8 सूत्रीय मांग पत्र और प्रशासन का रुख

​दरभा तहसीलदार को सौंपे गए 8 सूत्रीय ज्ञापन में केवल वृक्षारोपण और जंगल बचाने की बात नहीं है, बल्कि बस्तर दशहरे में शामिल होने वाले ग्रामीणों की सुविधाओं का मुद्दा भी उठाया गया है। ग्रामीणों की मांग है कि दूर-दराज से आने वाले ग्रामीणों और देवी-देवताओं के लिए जगदलपुर शहर व दशहरा परिसर में ठहरने और भोजन की उत्तम व्यवस्था की जाए।

​बस्तर का यह आंदोलन दिखाता है कि आदिवासी समाज अपनी सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने के साथ-साथ अपने जंगलों की सुरक्षा के प्रति भी सजग है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन परंपराओं के निर्वहन और पर्यावरण संरक्षण के बीच किस तरह का सामंजस्य बैठाता है।

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