कांकेर: उत्तर बस्तर का कांकेर जिला इन दिनों जंगली भालुओं के लगातार बढ़ते आतंक से थर्राया हुआ है। बीती रात कांकेर शहर से लेकर आसपास के ग्रामीण इलाकों तक एक जंगली भालू भोजन की तलाश में भटकता रहा। पूरी रात रिहायशी बस्तियों और गलियों में भालू की चहलकदमी से स्थानीय लोगों में गहरी दहशत का माहौल बना हुआ है।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह कोई एक दिन की घटना नहीं है। घने जंगलों में भोजन की कमी के कारण भालू आए दिन भोजन और पानी की तलाश में इंसानी आबादी के बीच पहुंच रहे हैं। शाम ढलते ही लोग अपने घरों में दुकने को मजबूर हैं, वहीं रात भर किसी अनहोनी का डर बना रहता है। शहर के साथ-साथ सीमावर्ती गांवों में भी भालुओं की लगातार दस्तक से जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है।
अधर में लटकी योजना, वन विभाग पर भड़के लोग
भालुओं की इस घुसपैठ से आक्रोशित ग्रामीणों और शहरवासियों ने सीधे तौर पर वन विभाग की लापरवाही पर सवाल खड़े किए हैं। लोगों का आरोप है कि रिहायशी इलाकों से भालुओं को सुरक्षित रेस्क्यू कर घने जंगलों (कोर फॉरेस्ट एरिया) में छोड़ने की योजनाएं लंबे समय से केवल कागजों और बैठकों तक ही सीमित हैं।
ग्रामीणों का कहना है:
- त्वरित कार्रवाई का अभाव: घटना या सूचना देने के घंटों बाद भी वन विभाग की टीम मौके पर नहीं पहुंचती।
- ठोस रणनीति की कमी: भालुओं को आबादी वाले क्षेत्रों से दूर रखने के लिए कोई स्थाई बाड़ा या ट्रैकिंग सिस्टम प्रभावी नहीं दिख रहा।
- हादसे का इंतजार: लोगों ने कड़े शब्दों में पूछा है कि क्या विभाग किसी बड़े हादसे या जनहानि का इंतजार कर रहा है?
बढ़ रहा है बड़े हादसे का खतरा
रिहायशी क्षेत्रों में भालुओं की बढ़ती आवाजाही से न केवल फसलों और मवेशियों को नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि इंसानों और वन्यजीवों के बीच सीधे संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) का खतरा भी चरम पर पहुंच गया है। यदि समय रहते वन विभाग ने कोई कड़ा और ठोस कदम नहीं उठाया, तो किसी दिन कोई बड़ा हादसा हो सकता है।
अब क्षेत्र की जनता का केवल एक ही सवाल है—आखिर कब मिलेगी इस खौफ से निजात और कब इन भालुओं को आबादी से दूर सुरक्षित जंगलों में भेजा जाएगा?