जगदलपुर । बस्तर की विश्वविख्यात हस्तशिल्प कला के संरक्षण और स्थानीय कारीगरों की आजीविका को मजबूत करने के उद्देश्य से जिला पंचायत बस्तर के सभाकक्ष में एक महत्वपूर्ण कार्यशाला एवं बैठक का आयोजन किया गया। ‘स्वदेशी शिल्पकला पुनरुद्धार परियोजना’ के तहत आयोजित इस बैठक में शिल्पकार परिवारों, स्व-सहायता समूह की महिलाओं, ट्राईफेड (TRIFED), नीति आयोग के प्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने भाग लिया।
10-सूत्रीय कार्ययोजना और मुख्य उद्देश्य
बैठक में ‘बस्तर आर्ट्स’ परियोजना का विस्तृत प्रस्ताव 10-सूत्रीय कार्ययोजना के साथ प्रस्तुत किया गया। इसका मुख्य ध्येय ढोकरा, लौह शिल्प, काष्ठ कला, टेराकोटा, बांस, कौड़ी शिल्प, सीसल कला और पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा को ‘कलागुड़ी बस्तर आर्ट्स’ ब्रांड के रूप में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना है।
एक्शन प्लान के प्रमुख बिंदु
कारीगरों के साथ आयोजित खुले संवाद सत्र के सुझावों के आधार पर निम्नलिखित व्यावहारिक कदम उठाने का निर्णय लिया गया है:
- रॉ मटेरियल बैंक: कच्चे माल की सुलभता के लिए क्लस्टर स्तर पर रॉ मटेरियल बैंक की स्थापना।
- कौशल उन्नयन व प्रशिक्षण: भारतीय शिल्प एवं डिजाइन संस्थान (IICD) के मास्टर ट्रेनर्स द्वारा आधुनिक डिजाइन व स्किल डेवलपमेंट कार्यशालाएं।
- वित्तीय सहायता: उत्पादन की निरंतरता बनाए रखने के लिए रोटेशनल वर्किंग कैपिटल फंड की व्यवस्था।
- प्रामाणिकता (बस्तर ट्रेसकोड): उत्पादों की असलियत और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए ‘बस्तर ट्रेसकोड’ तकनीक का प्रयोग।
- लाइव डेमोंस्ट्रेशन व बिक्री केंद्र: पर्यटकों और शोधार्थियों के लिए एक विशेष केंद्र, जहाँ वे सीधे कारीगरों को कलाकृति बनाते देख सकेंगे और बिना बिचौलियों के खरीदारी कर सकेंगे।
- सांस्कृतिक पर्यटन: प्रशिक्षित गाइड्स के माध्यम से इस केंद्र को एक सांस्कृतिक व शैक्षणिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना।
परियोजना का संभावित प्रभाव
इस साझा प्रयास का अंतिम लक्ष्य बिचौलियों की भूमिका को समाप्त कर स्थानीय शिल्पकारों की आय में 2 से 3 गुना तक सीधी बढ़ोतरी करना है, जिससे बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक पटल पर एक नया आयाम मिलेगा।


