डेस्क । छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों अंतर्कलह और प्रशासनिक सुगबुगाहट अपने चरम पर है। हाल ही में राजधानी रायपुर में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में पार्टी के भीतर का असंतोष खुलकर सामने आ गया। प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी के सामने पूर्व विधायकों और सांसदों के बाद अब वर्तमान सांसदों ने भी मंत्रियों और नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) के खिलाफ तीखा मोर्चा खोल दिया है। बैठक के दौरान जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा और हावी होती अफसरशाही का मुद्दा मुख्य केंद्र बिंदु रहा।

सांसदों का दर्द: “सिर्फ पत्र लिखने लायक रह गए हैं सांसद”
बैठक में सांसदों ने अपना दर्द और गुस्सा खुलकर जाहिर किया। उनका मुख्य आरोप था कि राज्य सरकार के मंत्री उनकी सिफारिशों को तनिक भी तवज्जो नहीं दे रहे हैं।
- कार्यकर्ताओं के तंज़ से आहत सांसद: स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि पार्टी के कार्यकर्ता अब सांसदों से यह कहते हैं कि “आप सिर्फ एक संस्तुति पत्र (Recommendation Letter) लिख दीजिए, बाकी काम हम अपने रास्ते से करवा लेंगे।”
- पिछले दरवाजे से हो रहे काम: सांसदों का आरोप है कि जो काम उनके कहने पर खारिज कर दिए जाते हैं या अटके रहते हैं, वे अन्य माध्यमों या ‘दूसरे रास्तों’ से आसानी से हो जाते हैं।
- अधिकारियों पर गंभीर आरोप: एक सांसद ने तो यहाँ तक कह दिया कि मौजूदा समय में अफसर जनता या जनप्रतिनिधियों की सुनने के बजाय केवल अपने निजी लाभ और पैसे कमाने में जुटे हुए हैं।
”केंद्रीय राज्य मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष तक की नहीं सुनी जाती”
जब प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी ने एक वरिष्ठ सांसद से पूछा कि आखिर इस प्रकार की स्थितियाँ क्यों बन रही हैं और ऐसा कैसे संभव है, तो उन्होंने दो टूक जवाब दिया कि “प्रदेश में पूरी तरह से ब्यूरोक्रेसी हावी हो चुकी है, और जहां ऐसा होगा, वहां ऐसी ही बदतर स्थिति देखने को मिलेगी।”
मामले की गंभीरता को भांपते हुए स्मृति ईरानी ने तत्काल प्रभाव से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, उपमुख्यमंत्री अरुण साव और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा को भी बैठक में तलब कर लिया। शीर्ष नेतृत्व के सामने सांसदों ने अपनी शिकायतों को बिना किसी झिझक के दोहराया। एक सांसद ने तो यहाँ तक दावा कर दिया कि “हमारी तो छोड़िए, केंद्रीय राज्य मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष तक के आदेशों और सिफारिशों को अनसुना कर दिया जाता है।”
आगे की राह और राजनीतिक निहितार्थ
यह घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी संगठन और शासन के बीच तालमेल में कहीं न कहीं भारी कमी खल रही है। जहां एक ओर सरकार विकास कार्यों के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर ज़मीनी स्तर पर जनप्रतिनिधियों और नौकरशाही के बीच की यह तनातनी पार्टी के लिए चिंता का विषय बन गई है।
प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी के हस्तक्षेप और मुख्यमंत्री के समक्ष इन मुद्दों के उठने के बाद, यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस अंदरूनी कलह और बेलगाम होती अफसरशाही पर लगाम लगाने के लिए क्या सख्त कदम उठाती है।