बस्तर (छत्तीसगढ़): अपनी अनूठी परंपराओं और सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर को समेटे हुए विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व की एक और बेहद महत्वपूर्ण और भावुक रस्म ‘कुटुंब जात्रा’ शनिवार को संपन्न हुई। इस पारंपरिक रस्म के साथ ही बस्तर संभाग के कोने-कोने से पहुंचे हजारों देवी-देवताओं को राजपरिवार और स्थानीय श्रद्धालुओं द्वारा ससम्मान अपने-अपने धाम के लिए विदा किया गया।
राजपरिवार ने की पूजा-अर्चना, ‘रुसुम’ देकर किया विदा
कुटुंब जात्रा रस्म के दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की। पर्व में शामिल हुए देवी-देवताओं के छत्र, डोली और प्रतीकों (सिम्बोल) को नमन करते हुए राजपरिवार द्वारा ‘रुसुम’ (पारंपरिक भेंट/सम्मान) देकर उन्हें विदाई दी गई।
अबूझमाड़ के देवी-देवता बने विशेष आकर्षण
इस वर्ष का बस्तर दशहरा कई मायनों में ऐतिहासिक और खास रहा। इस बार पर्व में 200 से अधिक नए देवी-देवता शामिल हुए।
कमलचंद भंजदेव ने बताया कि इस बार इंद्रावती नदी के पार स्थित अबूझमाड़ क्षेत्र के देवी-देवता भी बस्तर दशहरा का हिस्सा बने। वर्षों से नक्सलवाद और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इस दुर्गम इलाके के देवी-देवता विश्व प्रसिद्ध दशहरा पर्व में शामिल नहीं हो पाते थे। लेकिन इस बार सुरक्षा और बदलते हालातों के बीच अबूझमाड़ से भी बड़ी संख्या में देवी-देवता पर्व में पहुंचे, जो बस्तर में शांति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का बड़ा प्रतीक है।

परंपरा अनुसार दी गई बलि
बस्तर दशहरा की अनूठी परंपराओं के तहत विदाई समारोह में बलि प्रथा का पालन भी किया गया। कुटुंब जात्रा रस्म के दौरान देवी-देवताओं को प्रसन्न करने और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना के साथ बकरा, मुर्गा, कबूतर और बतख की बलि देकर इस पारंपरिक अनुष्ठान को पूरा किया गया।
सांस्कृतिक एकता का प्रतीक ‘कुटुंब जात्रा’
75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि संपूर्ण बस्तर अंचल की सामाजिक और सांस्कृतिक एकजुटता का पर्व है। कुटुंब जात्रा रस्म इस बात का प्रमाण है कि कैसे आधुनिकता के दौर में भी बस्तर अपनी प्राचीन जनजातीय परंपराओं और आस्था को पूरी शिद्दत से सहेजे हुए है। देवी-देवताओं की इस विदाई के साथ ही इस वर्ष का भव्य दशहरा उत्सव अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ गया।