डेस्क । छत्तीसगढ़ के ग्राम स्तर पर जल, जंगल, जमीन और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को सहेजने के लिए स्थानीय निकायों का मजबूत रुख एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में छत्तीसगढ़ के पुनपल्ली ग्राम सभा ने अपनी बैठक में सामुदायिक हितों, पारंपरिक व्यवस्था और सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए हैं।


इस बैठक का सबसे चर्चित और प्रभावकारी निर्णय निर्णय क्रमांक 6 रहा, जो ग्राम सभा की भूमि के उपयोग और धार्मिक गतिविधियों के नियमन से जुड़ा हुआ है।
निर्णय क्रमांक 6: भूमि आवंटन एवं धार्मिक गतिविधियों पर बड़ा फैसला
ग्राम सभा द्वारा पारित प्रस्ताव के अनुसार:
- भूमि आवंटन पर रोक: ईसाई एवं धर्मांतरित व्यक्तियों के लिए शव दफनाने (मसीही कब्रिस्तान), चर्च निर्माण, प्रार्थना सभाओं तथा अन्य किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधियों के लिए ग्राम सभा की सार्वजनिक या सामुदायिक भूमि उपलब्ध नहीं कराई जाएगी।
- धार्मिक प्रचार व प्रार्थना सभाओं पर पाबंदी: ग्राम सभा परिसर एवं गांव के सार्वजनिक सूचना पटल पर यह स्पष्ट रूप से अंकित किया गया है कि गांव की सीमा के भीतर बिना ग्राम सभा की पूर्वानुमति के धार्मिक प्रचार, धर्मांतरण या अनधिकृत प्रार्थना सभाओं का संचालन पूरी तरह वर्जित रहेगा।
किन कानूनों और अधिकारों का दिया गया हवाला?
पुनपल्ली ग्राम सभा ने अपने इस कड़े फैसले को संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों के दायरे में सही ठहराते हुए निम्नलिखित प्रावधानों का हवाला दिया है:
- भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची (Fifth Schedule): जो अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और भूमि के संरक्षण के लिए विशेष अधिकार प्रदान करती है।
- पेसा अधिनियम 1996 (PESA Act): पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 के तहत ग्राम सभा को अपनी रूढ़िजन्य परंपराओं, सामाजिक पहचान और सामुदायिक संसाधनों की रक्षा करने का सर्वोच्च अधिकार प्राप्त है।
- छत्तीसगढ़ पेसा नियम 2022: राज्य सरकार द्वारा लागू पेसा नियमों के तहत ग्राम सभाओं को गांव के आंतरिक मामलों, भूमि हस्तांतरण और सामाजिक समरसता बनाए रखने के संदर्भ में निर्णय लेने की स्वायत्तता दी गई है।
स्थानीय पहचान और सामुदायिक हितों की सुरक्षा
ग्राम सभा के सदस्यों का मानना है कि पिछले कुछ समय से गांव की पारंपरिक व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ रहा था। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य गांव की मूल संस्कृति, पारंपरिक मान्यताओं और रूढ़िजन्य व्यवस्था को अक्षुण्ण बनाए रखना है।
यह फैसला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि बस्तर और छत्तीसगढ़ के अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून के तहत ग्राम सभाएं अपने अधिकारों और पहचान को लेकर कितनी जागरूक और सशक्त भूमिका निभा रही हैं।