दलपत सागर का वजूद बचाने फिर करोड़ों का दांव: NMDC की मदद और 9.88 करोड़ की नई योजना के बीच उठते 13 करोड़ के पुराने सवाल

जगदलपुर (बस्तर): बस्तर रियासत के राजा दलपत देव द्वारा निर्मित और 340 एकड़ में फैला प्रदेश का सबसे बड़ा ऐतिहासिक तालाब ‘दलपत सागर’ एक बार फिर अपनी बदहाली और सफाई अभियानों को लेकर सुर्खियों में है। सागर को जलकुंभी से मुक्त कराने और इसके संरक्षण के लिए जगदलपुर नगर निगम और NMDC (नगरनार इस्पात संयंत्र) के बीच एक समझौता (MoU) हुआ है।
इस समझौते के तहत NMDC अपने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) मद से 50 लाख रुपए की वित्तीय सहायता देगा, जिसकी 20 लाख रुपए की पहली किस्त जारी भी कर दी गई है।
खर्चों का लेखा-जोखा: पुरानी योजनाएं और नए दावे
दलपत सागर का बड़ा हिस्सा आज भी हरी-भरी जलकुंभी की चादर से ढका हुआ है। रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले 20 वर्षों में इसके संरक्षण पर भारी-भरकम राशि पानी की तरह बहाई गई है, लेकिन नतीजे सिफर रहे।
20 वर्षों का इतिहास: पिछले दो दशकों में सफाई और सौंदर्याकरण के नाम पर 13 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए जाने का दावा है।
निगम की 2024 की रिपोर्ट: वर्ष 2024 में प्रस्तुत निगम की रिपोर्ट के अनुसार, केवल जलकुंभी हटाने पर करीब 3 करोड़ रुपए खर्च हुए। इसमें 80 से 90 लाख रुपए की लागत से खरीदी गई वीड हार्वेस्टर (Weed Harvester) मशीन भी शामिल है।
अधूरी घोषणाएं: वर्ष 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 3 करोड़ रुपए की घोषणा की थी। इसके तहत राजा दलपत देव की मूर्ति, परिक्रमा पथ, स्ट्रीट लाइट, घाट निर्माण और फ्लोटिंग रेस्टोरेंट जैसे प्रोजेक्ट प्रस्तावित थे, जो आज तक धरातल पर नहीं उतर सके।
नई उम्मीद: 9.88 करोड़ का मास्टर प्लान
पुराने असफल प्रयासों के बाद अब प्रशासन ने एक और नए प्लान के साथ मैदान में उतरने का फैसला किया है:
मुख्यमंत्री नगरोत्थान योजना: योजनाबद्ध सौंदर्याकरण के लिए 9 करोड़ 88 लाख रुपए की स्वीकृति मिल चुकी है।
डेडलाइन मार्च 2027: नगर निगम आयुक्त प्रवीर वर्मा के अनुसार, दलपत सागर को मार्च 2027 तक पूरी तरह जलकुंभी मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
NMDC का सहयोग: 50 लाख रुपए के सीएसआर फंड से तत्काल सघन सफाई अभियान चलाकर जलकुंभी हटाने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
स्थायी समाधान में असली बाधा क्या है?
करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद जलकुंभी बार-बार क्यों पनप आती है? पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय नागरिकों के अनुसार इसके मुख्य कारण और समाधान निम्नलिखित हैं:
गंदे नालों का प्रवाह: शहर के कई बड़े नालों का प्रदूषित पानी सीधा दलपत सागर में आकर गिरता है। यह प्रदूषित जल जलकुंभी के पनपने के लिए खाद का काम करता है।
केवल निकालने पर जोर: प्रशासन का ध्यान सिर्फ जलकुंभी को बाहर निकालने पर रहता है, उसे दोबारा पनपने से रोकने वाले पोषक तत्वों (नालों के पानी) पर नहीं।
नागरिकों की मांग: विशेषज्ञों का साफ मानना है कि जब तक नालों के पानी का डायवर्जन नहीं होगा और जलप्रवाह (Water Flow) की सही व्यवस्था नहीं बनेगी, तब तक चाहे 13 करोड़ खर्च हों या 50 करोड़, समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

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