बस्तर दशहरे की अनूठी रस्म: ‘जोगी बिठाई’ और उसकी छह सौ साल पुरानी तपस्या

डेस्क । छत्तीसगढ़ का विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा अपनी भव्यता, विशिष्ट परंपराओं और लगभग 75 दिनों तक चलने वाले आयोजनों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। देश के अन्य हिस्सों में जहाँ दशहरे का मतलब रावण दहन और रामलीला से होता है, वहीं बस्तर में यह पर्व शक्ति स्वरूपा माई दंतेश्वरी और क्षेत्रीय देवी-देवताओं की आराधना को समर्पित है। इस विशाल महापर्व के कई दिलचस्प अनुष्ठानों में से एक बेहद महत्वपूर्ण और कठिन रस्म है—’जोगी बिठाई’ (Jogi Bithai)। 


क्या है ‘जोगी बिठाई’ रस्म?
शारदीय नवरात्रि की शुरुआत के साथ ही जगदलपुर के ऐतिहासिक सिरहासार भवन में ‘जोगी बिठाई’ की रस्म पूरी निष्ठा और विधि-विधान के साथ संपन्न की जाती है। इस परंपरा के तहत, हलबा या विशेष आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाला एक युवक (जिसे ‘जोगी’ या ‘योगी’ कहा जाता है) सिरहासार भवन के भीतर बनाए गए लगभग 3 से 4 फीट गहरे गड्ढे में पालथी मारकर बैठता है।
यह जोगी आगामी 9 दिनों (नवरात्रि के पूरे नौ दिन) तक उसी गड्ढे में रहकर कठोर तपस्या और व्रत का पालन करता है। 
क्यों निभाई जाती है यह रस्म? (धार्मिक मान्यता और उद्देश्य)
बस्तर दशहरे के इस अनुष्ठान के पीछे मुख्य मान्यता यह है कि यह 75 दिनों तक चलने वाला विश्व का सबसे लंबा दशहरा पर्व बिना किसी बाधा, विघ्न या अमंगल के शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो जाए।
ऐसा माना जाता है कि जोगी की यह कठिन साधना और तपस्या मां दंतेश्वरी को प्रसन्न करती है और पूरे उत्सव की रक्षा करती है।
यह तपस्या बस्तर की लोक आस्था, अध्यात्म और प्रकृति के प्रति समर्पण का एक अनूठा प्रतीक है। 
लगभग 600 साल पुरानी परंपरा
बस्तर रियासत काल से चली आ रही यह परंपरा करीब 600 साल पुरानी मानी जाती है। इतिहास और लोक कथाओं के अनुसार, जब काकतीय राजवंश के राजाओं ने इस उत्सव की शुरुआत की थी, तब से लेकर आज तक इस परंपरा के नियमों का सख्ती से पालन किया जाता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुछ विशेष परिवारों और गांवों (जैसे बड़े आमाबाल आदि) के युवक इस जिम्मेदारी को निभाते आ रहे हैं। राजवंश के समय से ही राजा या प्रशासनिक प्रतिनिधि इस रस्म के साक्षी बनते आए हैं। 
अत्यंत कठिन साधना और नियम
जोगी की यह नौ दिवसीय साधना बेहद कड़े अनुशासन से जुड़ी होती है: 
निर्जल और निराहार व्रत: इन नौ दिनों के दौरान जोगी انتہائی कठिन नियमों का पालन करते हुए साधना में लीन रहता है। 
एकांत और योग मुद्रा: वह सिरहासार भवन के उस छोटे से गड्ढे में बिना हिले-डुले योग मुद्रा में ध्यानमग्न रहता है। 
दर्शन के लिए भीड़: इन नौ दिनों तक मां दंतेश्वरी के दर्शन के साथ-साथ इस भूमिगत जोगी के दर्शन करने के लिए भी दूर-दूर से श्रद्धालु सिरहासार भवन पहुंचते हैं। 
समापन: ‘जोगी उठाई’ रस्म
नवरात्रि के समापन और दशमी के आसपास जब यह नौ दिवसीय तपस्या पूरी होती है, तब ‘जोगी उठाई’ (या जोगी उठान) की रस्म होती है। इसके बाद जोगी को उनके इस कठिन तप के लिए बस्तर राजपरिवार और प्रशासन की ओर से सम्मानित किया जाता है। 
निष्कर्ष
बस्तर दशहरे की ‘जोगी बिठाई’ रस्म केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह बस्तर की आदिम संस्कृति, अटूट आदिवासी आस्था और सामूहिक जिम्मेदारी का जीवंत दस्तावेज है। आधुनिक दौर में भी अपनी इन प्राचीन जड़ों को सहेज कर रखना बस्तर की संस्कृति की सबसे बड़ी खूबी है, जो पूरी दुनिया के पर्यटकों और शोधकर्ताओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। 

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